Tag: नज़्म

अधूरे ख़्वाब…(नज़्म)

रात के बारह कब बजे कुछ पता ही नही चला। मैं अपने ख़यालों को कागज़ पर उतारता रहा। फिर आँखें कुछ बोझिल सी होने लगी और दिमाग भी थोड़ा …

भरम….

कभी कभी लगता, जैसे ये मौसम कितना प्यारा है ! अहसाह होता जैसे, ये हवाये भी करती कुछ इशारा है !! अब कौन समझेगा मतलबी दुनिया में जज्जबातो को …

सिलसिला

सिलसिला रघुकुल रीति सदा चली आई का चलन आज भी जारी है ! कुछ सामाजिक कुरीतियों का सिलसिला आज भी जारी है !! रखते है भगवान को जेब से …

गजल -मुहब्बत की बदली है ताबीर देखो |

मुहब्बत की’ बदली है’ ताबीर देखो | मिटा कोई रांझा हँसी हीर देखो || हुए जख्म दिल पर हैं’ गंभीर देखो | न तरकश दिखा ना दिखा तीर देखो …

रेखा

मिलायी नज़र से, नज़र मैंने तुझसे जिधर देखा मैंने, तेरा अक्श देखा भले आयना, तेरा सच्चा हो लाखो मगर मैंने देखा, वो कहा उसने देखा तेरी मर्जिओ से मैं, नावाकिफ …

नज़्म – एक कवि की मौत

आखरी सांस तक लड़ता रहा.   आपनी उंगली से हवा पे लिखता रहा उसे.   जितनी देर सांस चली तरसता रहा घोलता रहा खून की सिहाई और डॉक्टर्स सुलाते …

हम नजर आयेंगे

बारिश की बूंदों मे तुम्हे हम नजर आयेंगे, झाकोंगे जब खिड्की से अनजाने नन्हे फरिश्ते नजर आयेंगे, दूंढ नही पाओगे कोई अपना उस अजनबी भीड़ मे , क्योंकि हर …

सभ्य समाज!!!-1

कितनी दफ़े मैं सोचता हूँ, तेरे साथ चलूँ, पर हर बार, तू मुझसे आगे निकल जाता है. पता नहीं, ये तुम्हारी आदत है, या तुम मुझे साथ लेना नहीं चाहते, …

शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है…

ईमान फिर किसी का नंगा हुआ है. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है.. वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है. ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है.. फिर से गलियां देखो खूनी हुई हैं. गोद कितने मांओं की सूनी हुई हैं.. उस इन्सान का, क्या कोई बच्चा नहीं है? वो इन्सान क्या, किसी का बच्चा नहीं है?? हाँ, वो किसी हव्वा का ही जाया है. वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है. ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है… लोथड़े मांस के लटक रहे हैं. खून किसी खिडकी से टपक रहे हैं.. आग किसी की रोज़ी को लग गयी है. कोई बिन माँ की रोजी सिसक रही है.. हर एक कोने आप में ठिठक गये हैं. बच्चे भी अपनी माँओं से चिपक गये हैं.. इन्सानियत का खून देखो हो रहा है. ऊपर बैठा वो भी कितना रो रहा है.. दूर से कोई चीखता सा आ रहा है. खूनी है, या जान अपनी बचा रहा है.. और फिर सन्नाटा सा पसर गया है. जो चीख रहा था, क्या वो भी मर गया है?? ये सारा आलम उस शख्स का बनाया है. …

जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ

“जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ अर्चना के दीप से ही मन्दिर जलते देखता हूँ । देखता हूँ रात्रि से भी ज्यादा काली भोर को …

कितने बच्चे सोते हैं रोज़ रखकर पेट में लातें अपनी

कितने बच्चे सोते हैं रोज़ रखकर पेट में लातें अपनी बना नहीं अभी कच्चा है कह देती है रोकर जननी । भोर हुए उठते हैं जब पाते हैं दो …

शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर जरुरत है

नज़्म “शहीदो लौट आओ अब, तुम्हारी फिर ज़रूरत है ||”   अजब छाई हुई अहले वतन पर आज गफ़लत है | हवालों और घुटालों से इन्हें मिलती न फुर्सत …

बुरे कर्मों का देखो मैंने कितना दुःख उठाया है

बुरे कर्मों का देखो मैंने कितना दुःख उठाया है मेरा साया मुझको ही अपनाने से कतराता है जिसको मारी ठोकर आज उसी के दर पे जाता हूँ रो-रोकर अपने …

दीपक से मांगो न उजाला…

दीपक से मांगो न उजाला, सूरज का इंतज़ार करो चुपके-चुपके लम्हा-लम्हा, हृदय का विस्तार करो हम करें प्रार्थना उसकी जो मुक्ति देने वाला है एक वही जो इस जग …

नन्हें-मुन्ने की आँखों में है भारत का सपना

नन्हें-मुन्ने की आँखों में है भारत का सपना आज नहीं तो कल होगा पर होगा पूरा सपना भारत का सपना हो पूरा ये उद्देश्य हमारा है अपना-अपना देश सबको …