Tag: मुक्तक

ईर्ष्या को मन से त्याग दो – शिशिर मधुकर

खुशियां पानी है जीवन में ईर्ष्या को मन से त्याग दो झगडे फ़साद पर पानी डालो उनको ना कोई आग दो प्रेम ही जीवन बगिया में सुख की वर्षा …

शहर की आबो-हवा – डी के निवातिया

शहर की आबो-हवा रुक सा गया है वक़्त क्यूँ थम सा गया है रवानी से बहता लहू, अब जम सा गया है कुछ तो गड़बड़ है, शहर की आबो-हवा …

केवल निगाहों में – शिशिर मधुकर

मुहब्बत बह रही है तेरे मेरे बीच राहों में चलो लेलें एक दूजे को अपनी पनाहों में ज़माने को बताएंगे नहीं अपना ये रिश्ता साझा करेंगे खुशी अब केवल …

गीत झूठे खुशहाली के – डी के निवातिया

गीत झूठे खुशहाली के *** ऐ राजनीति झूठे वादों पर मत जा बंद नयनो को ज़रा खोलकर देख ! आसमा छूने वाले धरा पर मति ला हकीकत को सच …

मुझे अंदाज न था – शिशिर मधुकर

मुहब्बत कैसे होती है ये मैंने तुमको सिखलाया तुम्हें पाकर मेरा मन देख लो कितना इठलाया मुझे अंदाज न था इस छुपी ताकत का जज्बे में तुम जैसे पत्थर …

फक़त वो साथ है तेरा- शिशिर मधुकर

मुझे खुशियां जो देता है फक़त वो साथ है तेरा जिसे पकडूं तो गुल खिलते हैं वो बस हाथ है तेरा जिसे चूमूँ सुकूं मिलता है मुझको रूह के …

पीर पर्वत सी – शिशिर मधुकर

मुझे एहसास है तुम अब भी मेरी राह तकते हो लाख दुश्वारियां आएं मगर फिर भी ना थकते हो मुझे मालूम है वो पीर पर्वत सी तन्हा दिल की …

पायल – डी के निवातिया

“पायल” *** तुम जितना धीरे चलती हो, पायल उतना शोर करती है ! धड़कने दिल कि बहक जाती है, ये गज़ब का जोर करती है !! रह-रहकर यूँ सताती …

मुझे एहसास है – शिशिर मधुकर

तुम्हें ग़र छोड़ना होता तो फिर मैं पास क्यों आती तुम्हारे संग हसीं लम्हों के नए सपनें क्यों सजाती मेरी मजबूरियां समझो जो मैं तुमसे दूर रहती हूँ तड़पते …

लम्हें भी ठहरे हैं – शिशिर मधुकर

तेरी एक दीद को हम तो यहाँ कब से तरसते हैं वो बादल गड़गड़ाते हैं मगर फिर ना बरसते हैं उनको मालूम है हाथों में उनके बस करिश्में हैं …

ज्ञान बांच रहा है – डी के निवातिया

ज्ञान बांच रहा है +++ जिसे देखो आज वो ही ज्ञान बांच रहा है बच्चा बूढ़ा और जवान संग नाच रहा है धर्म-कर्म की गंगा बह रही है कलयुग …

प्रेम की लौ – डी. के. निवातिया

कोई कली जब फूल बनकर महक उठती है, उसे देख तबियत भंवरे कि चहक उठती है, महकने लगता है अहले चमन खुशबू से, सूने दिल मे भी प्रेम की …

अर्पण….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

तू मेरा मैं तेरी फिर किसे और क्या करूँ मैं अर्पण… भाव तुम से तुम्हीं भाव हो किसका करूँ समर्पण… निर्जीव ‘मैं’ में ‘तुम’ प्राण हो किसका करूँ मैं …

प्रेम चाहे पलों का हो- शिशिर मधुकर

वो तो परियों की रानी थी रूप उसका सलोना था किसी भी हाल में लेकिन उसे मेरा ना होना था मुझे मिलती थी वो जब भी सदा कुछ कहना …

दिल और दिमाग – डी के निवातिया

दिल और दिमाग कह लेने दो दिल की बाते, मिला आज मौका है दिल का नहीं भरोसा, अक्सर खा जाता धोखा है दिल और दिमाग कब देतें है साथ …

चाँदी की पायल – शिशिर मधुकर

हमें तुम क्या सताओगे हम तो वैसे ही घायल हैं वो तेरी सादगी है जिसके हम बरसों से कायल हैं भले ही पैरों में पहनों मगर ये सच तो …

आँचल में झांकना होगा – डी के निवातिया

आँचल में झांकना होगा * जमाने पे ऊँगली उठाने से पहले जांचना होगा हमको पहले खुद के आँचल में झांकना होगा गुनहेगारो के गुनाह पर नज़र डालने से पहले …

तुमने मुझको छांटा था-शिशिर मधुकर

बचपन में ना जाने मुझको कितना तुमने डांटा था गलती मैं जब करता था गालों पर पड़ता चांटा था सबने पूछा जब तुमसे चुन लो एक सुन्दर सा बच्चा …

माँ की गोद बिछौना- शिशिर मधुकर

हर बच्चा अपनी माता की आँखों का नूर सलौना है उसके प्रेम के आगे जग का हर स्नेह कितना बौना है कैसी भी पीड़ा हो लेकिन नींद जहाँ आ …

ख्यालों के दरमियाँ – डी के निवातिया

  ख्यालों के दरमियाँ *** टूटे-फूटे शब्दों के खंगर जोड़-जोड़ कर ज़ज़्बातो के पत्थरों को तोड़-तोड़ कर बनाया था एक मकाँ ख्यालों के दरमियाँ गुम गए उसमे सपनो की …

मज़दूर दिवस – डी के निवातिया

मज़दूर दिवस मज़दूर दिवस पहचान बना है श्रम बलिदान का कर्म करना ही पहला धर्म हो हर एक इंसान का न जाने क्यों हीन दृष्टि से देखा जाता है …