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तुम्हे पढ़ना नहीं आया

जिंदगी की क़िताब कुछ बिखरने सी लगी है बेचने की ख़ातिर इसे मुझे मढ़ना नहीं आया || लोग कहते है कि मुझे पत्थर गढ़ना नहीं आया तुम्हे क्या ख़ाक …

कब नीर बहेगा आँखों में ?

सागर कब सीमित होगा फिर से वो जीवित होगा आग जलेगी जब उसके अंदर प्रकाश फिर अपरिमित होगा || सूरज से आँख मिलाएगा कब तक झूमेगा रातों में ? …