Tag: कविता

आँसूओ में खो न जाए कहीं – अनु महेश्वरी

अनमोल होती है ज़िन्दगी अपनी, देखो आँसूओ में खो न जाए कहीं| रोकर हुआ न हासिल कुछ किसी को, ज़िन्दगी की ख़ुशी, मुस्कुराहट में छिपी| गमो के साथ भी …

मौलीक अधिकार – अनु महेश्वरी

अपने अधिकारो में फंसे हम ऐसे, सामने वाले का अधिकार भूल बैठे, किसी बात पे, शर्म नहीं आती, आज हमे, सारी बाते, लगती मौलीक अधिकार, हमे| बेमतलब की वहस …

साथ — डी के निवातिया

साथ अक्सर जब टहलता हूँ अकेले अकेले बांधे अपने दोनों हाथ कभी उगते सूरज को निहारने की आस में सुबह सुबह, कभी सूनी सूनी मुझको घेरे रात बातो ही …

बेटियों, से ज़िन्दगी होती है – अनु महेश्वरी

समय कब पंख लगा उड़ गया, कितना कुछ अब है बदल गया, जिसे अंगुल पकड़, मैंने चलना सिखाया था, आज वह चलते वक़्त, मेरा हाथ थाम लेती है, जिस …

गूंजी किलकारी

मेरे घर आंगन में गूंजी किलकारी आई इस बगिया में नव कलिका प्यारी प्रतीक्षा में जिसके बरस भए सुनने को जिसे कान तरस गए खिली कली बगिया महकी देख …

न झगड़े आपस में हम – अनु महेश्वरी

कठिन है राहे, मुश्किल है रास्ते, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, और न जाने कितने, अनगिनत परेशानिया के साथ है सफ़र, मंजिल अभी दूर है, पर साथ रहे अगर, भरोशा, …

रक्षा बंधन पे, दे दें यह उपहार, – अनु महेश्वरी

कोन तय करेगा हद क्या है, मेरे, चलने की, खाने की, बोलने की, हँसने की, घूमने की, कपड़ो की, मैं या मेरे अपने या यह समाज, क्यों हम इतना …

अपने अंदर का अँधियारा दूर करले – अनु महेश्वरी

कही पर भाषा की है लड़ाई, कही पर अहम् की है लड़ाई, कही पर अस्तित्त्व की है लड़ाई, कही पर बेवजह की है लड़ाई| बस चारो हो रहा है, …

अकड़

जब तक जिस्म में जान रही तब तक अकड़ आँखों की पहचान रही और जिस्म से जान निकलते ही यह आँखों से तो जाती रही मगर खुद जिस्म की …

रिश्तों से ही, ज़िन्दगी है चलती – अनु महेश्वरी

दिलों के बीच अगर, फासले आ जाते है रिश्ते भी तब हाथ से, फिसलने लग जाते है रिश्तों को अगर है संभालना, एक दूसरे का मान तब रखना, एक …

शिव-शंकर-महादेव – अनु महेश्वरी

  है जटाधारी, करे नन्दी सवारी, है निल कंठ| त्रिशूल धारी, गले में सर्प माला, डमरूधारी| त्रिकालदर्शी, मस्तक पे चंद्रमाँ, कैलाश वाशी| हे विष धारी, हे त्रिलोक के स्वामी, …

दया धर्म को बस अपना लो – अनु महेश्वरी

घर के अंदर रहे जब हम, माने किसी भी पंथ को हम, सिख, ईसाई, हिन्दू, मुसलमान, घर के बाहार, बस रहे हम इंसान| मह्जब हम्हारा हो इंसानियत, धर्म हम्हारा हो …