Tag: कविता

जमाने ने यह कैसी करवट ली – अनु महेश्वरि

जमाने ने यह कैसी करवट ली है, शोर के बीच एक खामोशी सी है। यह कैसे वक़्त का आगाज हुआ, हर कोई यहाँ देखो नाख़ुश ही है। बैचेनी का …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

एक की ख़ामोशी भी खलती है – अनु महेश्वरी

गलत या सही मापने का कोई पैमाना नहीं, पर मुश्किल होती, जब सिमित रख दायरा, अपनी समझ को ही, सब बस माने है सही। सब कुछ अपने हिसाब से …

खुद को समझे है ज्ञानी सब – अनु महेश्वरी

घर भरा रहता था, रिश्तेदारों से कभी, समय के साथ बदले मायने, दूर है सभी। लगे है भूलने रिश्तो की मर्यादा सब, निभाने की इन्हें फुर्सत भला कहाँ अब? …

ये कौन सा सभ्य समाज है (2)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – दो) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ख्यालों के दरमियाँ – डी के निवातिया

  ख्यालों के दरमियाँ *** टूटे-फूटे शब्दों के खंगर जोड़-जोड़ कर ज़ज़्बातो के पत्थरों को तोड़-तोड़ कर बनाया था एक मकाँ ख्यालों के दरमियाँ गुम गए उसमे सपनो की …

खुद से करते रहे वादें – अनु महेश्वरी

गैरो पे कैसे होगा, भला एतबार, जब घायल, अपनो के हाथों हुआ होगा? भरोसा गर चोटिल हो बार बार, फिर दुनिया में, जीना भी दुश्वार होगा| दूर से देख, …

ये कौन सा सभ्य समाज है (1)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – एक ) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: …

मज़दूर दिवस – डी के निवातिया

मज़दूर दिवस मज़दूर दिवस पहचान बना है श्रम बलिदान का कर्म करना ही पहला धर्म हो हर एक इंसान का न जाने क्यों हीन दृष्टि से देखा जाता है …

कितना गम है – डी के निवातिया

कितना गम है *** दिल में दर्द उठता है,जुबाँ खामोश, आँखे नम है मत पूछो यारो हमसे, जिंदगी में कितना गम है किसी का पसीना भी बहे, तो खबर …

इंसानियत की सीमा – डी के निवातिया

इंसानियत की सीमा — सोया हुआ है सिंह, सियार दहाड़ मार रहा है छल-कपट की लड़ाई में शूरवीर हार रहा है जाने किस करवट बैठेगा हैवानियत का ऊँट इंसानियत …

बुलबुल-ऐ-चमन – डी के निवातिया

बुलबुल-ऐ-चमन * कफ़स-ऐ-क़ज़ा में कैद बुलबुल-ऐ-चमन अपना है बनाएंगे जन्नत-ऐ-शहर इसे लगे बस ये सपना है फ़िक्र किसे मशरूफ सब अपनी बिसात बिछाने में नियत में ,राम-राम जपना पराया …

नहीं हो तुम कमज़ोर – अनु महेश्वरी

  रोज़ हो रहा चीरहरण, पर बचाने, कोन है आएगा? उठो, बनो वीरांगना, खुद को ही सम्भलना होगा, मूक बने इस समाज में खुद को ही बचाना होगा| इस …

नेताजी

तुम तो ठहरे नेताजी साथ क्या निभाओगे सत्ता हाथ आते ही हमको भूल जाओगे. जब भी चुनाव आएगा हमारी याद आएगी हाथ जोड़े आओगे हमको लुभाओगे उल्लू बनाने फिर …

बचाना भी है — डी के निवातिया

आँगन — फूलों और कलियों से आँगन सजाना भी है, कीचड और काँटों से दामन बचाना भी है, महकेगा चमन-ऐ- गुलिस्तां अपना तभी, हर मौसम की गर्दिश से इसे …