Tag: जिंदगी पर कविता

उलझा हुआ वो भी – अनु महेश्वरि

पुरुष शक्तिशाली या नारी, कोन किसपे परे है भारी, ये बहस तो चलती आयी है, सदियों तक चलती भी रहेगी। मेरा अनुभव तो कहता है, पुरुष भी मन से …

हम तुम्हे भुला न पाए …… (ग़ज़ल ) { अमर गायक स्व.मुहम्मद रफ़ी साहब की याद में }

कितने ही ज़माने गुज़र गए , मगर हम तुम्हें ना भुला पाए. तेरी तस्वीर पर सजदा किया, तेरी याद में दो अश्क बहाए. तेरे गीतों को जब सूना तो, …

भूख – डी के निवातिया

भूख *** ये भूख जाने कैसी है, मिटती नहीं तन-मन को तृप्ति, मिलती नहीं जो जितना अधिक पा जाता है चाहत फिर दोगुना बढ़ जाता है कोई दो जून …

ज़िन्दगी से शिकायत कैसी – अनु महेश्वरी

दर्द देती है, फिकी है कभी, फिर हसना भी सीखा रही, ज़िन्दगी से शिकायत कैसी, वह तो जीना ही सीखा रही| जुदाई है, गम देती है कभी, पर हर …

एक की ख़ामोशी भी खलती है – अनु महेश्वरी

गलत या सही मापने का कोई पैमाना नहीं, पर मुश्किल होती, जब सिमित रख दायरा, अपनी समझ को ही, सब बस माने है सही। सब कुछ अपने हिसाब से …

खुद को समझे है ज्ञानी सब – अनु महेश्वरी

घर भरा रहता था, रिश्तेदारों से कभी, समय के साथ बदले मायने, दूर है सभी। लगे है भूलने रिश्तो की मर्यादा सब, निभाने की इन्हें फुर्सत भला कहाँ अब? …

नहीं हो तुम कमज़ोर – अनु महेश्वरी

  रोज़ हो रहा चीरहरण, पर बचाने, कोन है आएगा? उठो, बनो वीरांगना, खुद को ही सम्भलना होगा, मूक बने इस समाज में खुद को ही बचाना होगा| इस …

इंसानी फितरत — डी के निवातिया

इंसानी फितरत @ अपने पराये के फेर में दुनिया रहती है इंसानी फितरत है ये मेरी माँ कहती है हर दुःख दर्द का इलाज़ है आत्ममंथन कहने को भावो …

रुआना आ गया – डी के निवातिया

रुआना आ गया ! कागज़, कलम, दवात, डायरी के पन्ने, ये सब तो अब बीते ज़माने कि बाते है व्हाट्सप्प, ट्वीटर, फेसबुक, भी छोडो वीडियो कॉलिंग का ज़माना आ …

मैं आधुनिक नारी हूँ

मै अबला नादान नहीं हूँ दबी हुई पहचान नहीं हूँ मै स्वाभिमान से जीती हूँ रखती अंदर ख़ुद्दारी हूँ मै आधुनिक नारी हूँ पुरुष प्रधान जगत में मैंने अपना …

रक्षा बंधन पे, दे दें यह उपहार, – अनु महेश्वरी

कोन तय करेगा हद क्या है, मेरे, चलने की, खाने की, बोलने की, हँसने की, घूमने की, कपड़ो की, मैं या मेरे अपने या यह समाज, क्यों हम इतना …

रिश्तों से ही, ज़िन्दगी है चलती – अनु महेश्वरी

दिलों के बीच अगर, फासले आ जाते है रिश्ते भी तब हाथ से, फिसलने लग जाते है रिश्तों को अगर है संभालना, एक दूसरे का मान तब रखना, एक …

अति विश्वास – शिशिर मधुकर

अति विश्वास में अक्सर यहाँ धोखा ही मिलता है सर्प कैसा भी हो वो तो केवल बिष ही उगलता है करो ना ज़िंदगी के फैसले कभी भी जल्दबाजी में …