Tag: ग़ज़ल

साथ और विश्वास – शिशिर मधुकर

अगर तूने मुझे आगोश में अपने लिया होता तेरी आँखों का जाम झूम कर मैंने पिया होता काश तुम माँग लेते हाथ मेरा चल पड़े थे जब मैंने सब …

पास आते तुम – शिशिर मधुकर

कमी तुम को अगर महसूस होती पास आते तुम यूँ ही रूठे ना रहते मुस्कान दे मुझको मनाते तुम लम्बी राहें मुहब्बत की कभी आसां ना होती हैं जलजलों …

रब ही लिखता है – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिससे हो जाए खुदा बस उसमें दिखता है बनाने से बना हैं कब ये रिश्ता रब ही लिखता है खरीदा हैं जहाँ उसने मगर ना प्रीत मिल पाई …

सताने लगे है – डी के निवातिया

सताने लगे है *** जब से हम काँटों को, गले से लगाने लगे है लोग फूलों की चुभन से, हमे सताने लगे है ! दर्द से रिश्ता कुछ जब …

अंदाज़ ए मुहब्बत – शिशिर मधुकर

सब कुछ लुटा के प्यार से मुझको ही लूटा है अंदाज़ ए मुहब्बत ये तेरा बिल्कुल अनूठा है शीशा ए दिल में पहले तो तेरी एक छवि थी छवियां …

बेचैनियां – शिशिर मधुकर

बेचैनियां घटती नहीं और दिल उदास है दूर है मेरी ज़िंदगी अब आती ना पास है मुद्दत हुईं आगोश में जो उसके सर रखा आज भी छूटी नहीं मिलने …

काल जीवन का – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिसने की मुझसे न संग उसने निभाया है अब तलक काल जीवन का ये मैंने तन्हा बिताया है सभी बस छल गए मुझको लुटा बैठा हूँ मैं अब …

सुकूं पाने की खातिर- शिशिर मधुकर

लाख चेहरे नज़र के सामने दुनियाँ में आते हैं एक जलवे तेरे हमको यहाँ लेकिन सताते हैं बड़ी उलझन सी होती है तू जैसे दूर रहता है मुहब्बत करने …

तुम ठहर जाओ कभी…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

(जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की एक ग़ज़ल है “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक…कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” इसी ज़मीन में लिखी मेरी …

धूप देखो तो ना खिली – शिशिर मधुकर (बिना रदीफ की ग़ज़ल )

लाख ढूंढा किया फिर भी मुहब्बत मुझको ना मिली रात गुजरी है दिन निकला धूप देखो तो ना खिली घाव देता रहा जो भी मिला उल्फ़त की राहों में …

तेरे इन्तज़ार में – सर्वजीत सिंह

तेरे इन्तज़ार में सुबह से शाम हो गई तेरे इन्तज़ार में अब देर ना करो तुम अपने दीदार में यहाँ पर तो लोग आते जाते बहुत हैं कोई खलल …

महोब्बत का मारा – सर्वजीत सिंह

महोब्बत का मारा महोब्बत को तेरी हमने नकारा नही पर तेरी बेरूखी भी हमें गवारा नहीं सुबह शाम किया है बस तुझे सजदा फिर भी लब से नाम तेरा …

उसकी कोई खबर नहीं आती…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

(जनाब मिर्जा ग़ालिब साहिब की एक ग़ज़ल है….”कोई उम्मीद बर नहीं आती…कोई सूरत नज़र नहीं आती”…. इसी ज़मीन में कोशिश की है मैंने ग़ज़ल लिखने की…. आपकी नज़र…) उसकी …