Tag: समसामयिक

लिख नहीं पाता हूँ – डी के निवातिया

लिख नहीं पाता हूँ *** लिखना चाहता हूँ पर लिख नहीं पाता हूँ आँखों के सामने तैरते कुछ ख्वाब, कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ आते है क्षण भर के लिए फिर …

जनसंख्या विस्फोट – शिशिर मधुकर

जनसंख्या विस्फोट है एक वोट का सारा खेल भारत का इसके कारण ही निकल रहा है तेल जाहिल जनता आँखें मूंदे भार बढ़ाती जाती है और अधिक भारत भूमि …

माँ बाप का प्यार – डी के निवातिया

माँ बाप का प्यार *** किसी ने बेगैरत कहा, किसी ने पाप का प्यार न पूछो कितना महंगा ,पड़ा है आप का प्यार सारी दुनिया खोजी मैंने सुख दुःख …

शहर की आबो-हवा – डी के निवातिया

शहर की आबो-हवा रुक सा गया है वक़्त क्यूँ थम सा गया है रवानी से बहता लहू, अब जम सा गया है कुछ तो गड़बड़ है, शहर की आबो-हवा …

अब ना राग बाकी है – शिशिर मधुकर

बुलाता है वो अपना पास पर ना आग बाकी है मधुरता खो गई गीतों में अब ना राग बाकी है तपते जेठ की गर्मी में वो सावन की उम्मीदें …

आँचल में झांकना होगा – डी के निवातिया

आँचल में झांकना होगा * जमाने पे ऊँगली उठाने से पहले जांचना होगा हमको पहले खुद के आँचल में झांकना होगा गुनहेगारो के गुनाह पर नज़र डालने से पहले …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ये कौन सा सभ्य समाज है (2)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – दो) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ये कौन सा सभ्य समाज है (1)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – एक ) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: …

हम ही दुष्ट हो गए – डी के निवातिया

हम ही दुष्ट हो गए *** यार तमाम अपने अब रुष्ट हो गए करके माल हज़म हष्ट-पुष्ट हो गए हमने उन्हें ज़रा सा क्या रोका टोका नजरो में उनकी …

काहे भरमाये — डी के निवातिया

काहे भरमाये *** काहे भरमाये, बन्दे काहे भरमाये नवयुग का ये मेला है बस कुछ पल का खेला है आनी जानी दुनिया के रंग मंच पे नहीं तू अकेला …

शब्द विवेचन- मेरा आईना- प्रेम

शब्द विवेचन – “प्रेम”   शब्द माला के “प” वर्ग के प्रथम और व्यंजन माला के इक्कीस वे अक्षर के साथ स्वर संयोजन के बना “अढाई अक्षर” का शब्द …

शिक्षा ही वरदान है – डी के निवातिया

शिक्षा ही वरदान है *** कल ही की बात है गावं से मैं गुज़र रहा था बुजर्गो की जमात से चौपाल जगमगा रहा था चर्चा बड़ी आम चली थी …

एक काम करे – डी के निवातिया

एक काम करे आओ मिलजुलकर एक काम करे मन के मैल का काम तमाम करे न रहे कोई गिला शिकवा आपसी तुम हमारा हम तुम्हारा नाम करे !! -*-*- …

उत्थान हर कोई कर रहा है – डी के निवातिया

उत्थान हर कोई कर रहा है भूखा बचपन, ममतत्व के आँचल में सिमटकर पूछे उत्थान हर कोई कर रहा है, मगर न जाने किसका !! सुदूर गाँव आज भी …

इंसानी फितरत — डी के निवातिया

इंसानी फितरत @ अपने पराये के फेर में दुनिया रहती है इंसानी फितरत है ये मेरी माँ कहती है हर दुःख दर्द का इलाज़ है आत्ममंथन कहने को भावो …

कुर्सी…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

हे कुर्सी तू बहुत ही प्यारी है… तेरी लीला बहुत न्यारी है…. तेरे जन्म पे मैं बलिहारी है… हे कुर्सी तू बहुत ही प्यारी है… अपना तेरा कोई धर्म …

इंसानियत बड़ी — डी के निवातिया

इंसानियत बड़ी *** मंदिर बने या मस्जिद इस पर बहस लड़ी है ईश्वर रहेगा या अल्लाह इस पर बात अडी है जब पूछा जरूररतमंद, भूखे-प्यासे इंसान से बोला, मिले …

दिवंगतों को मत बदनाम करो — डी के निवातिया

दिवंगतों को मत बदनाम करो *** अपने पूर्वजो की गैरत कटघरे ला दी तुमने आकर मीठी बातो में ! सत्तर साल की कामयाबी मिटा दी तुमने आकर के जज्बातो …

लकीर के फकीर — डी के निवातिया

लकीर के फकीर ! अब से अच्छा तो, कल परसो का बीता जमाना था अनपढ़, लाचारी में, लकीर के फकीर बन जाना था क्या हुआ, पढ़-लिखकर, चाँद या मंगल …

आला-रे-आला — डी के निवातिया

आला-रे-आला *** आला-रे-आला, सुन मेरे लाला, लगा ले अपनी जुबान पे ताला जो बोलेगा सच्ची सच्ची बाते, किया जायेगा उसका मुँह काला वतन व्यवस्था का टूटा पलंग है चरमारती …