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बसंत बहार— प्रकृति पर कविता —डी. के. निवातिया

बसंत बहार बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे ! गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार …