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मंजर – डी के निवातिया

मंजर *** हर मंजर से गुजर रहे है कुछ लोग, सियासत में अपना रूतबा जमाने को ! न जाने कितने गुलाब मसल डाले, फकत अपने नाम का गुल खिलाने …