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भूख – डी के निवातिया

भूख *** ये भूख जाने कैसी है, मिटती नहीं तन-मन को तृप्ति, मिलती नहीं जो जितना अधिक पा जाता है चाहत फिर दोगुना बढ़ जाता है कोई दो जून …