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बेगैरत

आबरू मेरी चाहतों की रोज ही लुटती है तमन्नाओं के तकिये पर सपने रोज सिसकते हैं | मुक़द्दस्त मालिक हो गया देखो ये जहां मेरा मुझे उधर घूमाते हैं …