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फर्क — डी के निवातिया

फर्क *** मै भी तो जर्रा हूँ उस बनौरी का जिसके सदा तुम सजदे करते हो ! क्या फर्क है उसमें और मुझमे उसे शिखर, मुझे तलवे रखते हो …