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ग़ज़ल (दोस्त अपने आज सब क्यों बेगाने लगतें हैं)

जब अपने चेहरे से नकाब हम हटाने लगतें हैं अपने चेहरे को देखकर डर जाने लगते हैं वह हर बात को मेरी क्यों दबाने लगते हैं जब हकीकत हम …

दर्द – मेरी शायरी……. बस तेरे लिए

दर्द हुस्न वालों का दर्द हम समझ तो सकते हैं पर बयाँ कर नहीं सकते ……………………………………. के कितनी तकलीफ होती है उन्हें अगर उनके हुस्न की कोई तारीफ ना …

क्यूँ दर्द की हर दास्तां रंगीन लगाती है…

वक़्त कैसा आ गया है, इस सफर में देखिये… जिंदगी हर मौत की शौकीन लगती है… तूने बनाई थी बड़ी हमदर्द ये दुनिया… संगदिल ये क्यूँ मुझे संगीन लगती …