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तुम्हे पढ़ना नहीं आया

जिंदगी की क़िताब कुछ बिखरने सी लगी है बेचने की ख़ातिर इसे मुझे मढ़ना नहीं आया || लोग कहते है कि मुझे पत्थर गढ़ना नहीं आया तुम्हे क्या ख़ाक …