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ठेस — डी के निवातिया

ठेस ◊♦◊♦◊ जिसको जितना चाहा उससे उतना दूर हो गये जब-जब किया हौंसला तब-तब मज़बूर हो गये उनकी नज़रो ने हमें पत्थर से शीशा बना डाला    लगी क्या …

ठेस – मेरी शायरी……. बस तेरे लिए

ठेस लबा लब भरा है दिल मेरा तेरी ही मोहब्बत से …………………………….. कहीं ठेस ना लगा देना के वो टूट के बिखर जाये ……………………………. शायर : सर्वजीत सिंह sarvajitg@gmail.com