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मेरा ठिकाना-2—मुक्तक —डी के निवातियाँ

अब किस किस को बतलाऊँ अपना ठिकाना सीमा पर रहता हूँ, हर दिशा है आना जाना   प्रेम से पुकारते है लोग मुझे कहकर जवान कर्म – धर्म है …