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गरीबी के निशान- अरूण कुमार झा बिट्टू

हैं राहे रेत ऐ एैसा की एक निशान छपता हैं, इस गरीबी के चादर के सब आर पार दिखता हैं छुपाना चाहता हूं मैं पहन कर जो जरा महगां …