Tag: किसान पर कविता

किसान

*किसान* चीर रहा वह विस्तृत भू को, गिरे स्वेद उसके तन से छन | झेल थपेड़े सदा प्रकृति के, करे सुगंधित वो जग-उपवन || हाय! स्थूल अस्थि चर्ममय तन …