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Author: zeba khan

Published articles: 56

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तू पास भी हो तो दिल बेक़रार अपना है / फ़राज़

12/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

तू पास भी हो तो दिल बेक़रार अपना है के हमको तेरा नहीं इंतज़ार अपना है मिले कोई भी तेरा ज़िक्र छेड़ देते हैं के जैसे सारा जहाँ राज़दार अपना है वो दूर हो तो बजा तर्क-ए-दोस्ती का ख़याल वो सामने हो तो कब इख़्तियार अपना है ज़माने भर के दुखों को लगा लिया दिल …

जिससे ये तबियत बड़ी मुश्किल से लगी थी / फ़राज़

12/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

जिससे ये तबीयत बड़ी मुश्किल से लगी थी देखा तो वो तस्वीर हर एक दिल से लगी थी तन्हाई में रोते हैं कि यूँ दिल के सुकूँ हो ये चोट किसी साहिब-ए-महफ़िल से लगी थी ए दिल तेरे आशोब ने फिर हश्र जगाया बे दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी खिलक़त का अजब …

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ / फ़राज़

12/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मुहब्बत[1] का भरम रख तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ पहले से मरासिम[2] न सही फिर भी कभी तो रस्मे-रहे-दुनिया[3] ही निभाने के लिए आ किस-किस को बताएँगे जुदाई का …

जब तेरी याद के जुगनू चमके / फ़राज़

12/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

जब तेरी याद के जुगनू चमके देर तक आँख में आँसू चमके सख़्त तारीक[1] है दिल की दुनिया ऐसे आलम[2] में अगर तू चमके हमने देखा सरे-बाज़ारे-वफ़ा[3] कभी मोती कभी आँसू चमके शर्त है शिद्दते-अहसासे-जमाल[4] रंग तो रंग है ख़ुशबू चमके आँख मजबूर-ए-तमाशा[5]है ‘फ़राज़’ एक सूरत है कि हरसू[6] चमके शब्दार्थ: ↑ घनी अँधेरी ↑ …

अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली / फ़राज़

12/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली आ चुके अब तो शब-ओ-रोज़ अज़ाबों वाले अब तो सब दश्ना-ओ-ख़ंज़र की ज़ुबाँ बोलते हैं अब कहाँ लोग मुहब्बत के निसाबों वाले ज़िन्दा रहने की तमन्ना हो तो हो जाते हैं फ़ाख़्ताओं के भी किरदार उक़ाबों वाले न मेरे ज़ख़्म खिले हैं न तेरा रंग-ए-हिना मौसम आये …

किसी से दिल की हिक़ायत कभी कहा नहीं की / फ़राज़

11/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

किसी से दिल की हिक़ायत कभी कहा नहीं की, वगर्ना ज़िन्दगी हमने भी क्या से क्या नहीं की, हर एक से कौन मोहब्बत निभा सकता है, सो हमने दोस्ती-यारी तो की वफ़ा नहीं की, शिकस्तगी में भी पिंदारे-दिल सलामत है, कि उसके दर पे तो पहुंचे मगर सदा नहीं की, शिक़ायत उसकी नहीं है के …

ख़ुशबू का सफ़र / फ़राज़

11/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

ख़ुशबू का सफ़र[1] छोड़ पैमाने-वफ़ा[2]की बात शर्मिंदा [3]न कर दूरियाँ ,मजबूरियाँ[4],रुस्वाइयाँ[5], तन्हाइयाँ[6] कोई क़ातिल ,[7]कोई बिस्मिल, [8]सिसकियाँ, शहनाइयाँ देख ये हँसता हुआ मौसिम है मौज़ू-ए-नज़र[9] वक़्त की रौ में अभी साहिल[10]अभी मौजे-फ़ना[11] एक झोंका एक आँधी,इक किरन , इक जू-ए-ख़ूँ[12] फिर वही सहरा का सन्नाटा, वही मर्गे-जुनूँ[13] हाथ हाथों का असासा[14],हाथ हाथों से जुदा[15] जब …

कुछ न किसी से बोलेंगे / फ़राज़

11/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

कुछ न किसी से बोलेंगे तन्हाई में रो लेंगे हम बेरहबरों का क्या साथ किसी के हो लेंगे ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन तेरे भेद न खोलेंगे जीवन ज़हर भरा साग़र कब तक अमृत घोलेंगे नींद तो क्या आयेगी “फ़राज़” मौत आई तो सो लेंगे

किताबों मे‍ मेरे फ़साने ढूँढते हैं / फ़राज़ यहां जाएं: भ्रमण, खोज

11/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं, नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं । जब वो थे तलाशे-ज़िंदगी भी थी, अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं । कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था, आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं । मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से, तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं । …

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे / फ़राज़

11/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल[1] बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार-ख़ार[2] है शाख़-ए-गुलाब[3] की मानिन्द[4] मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म[5] हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे ये लोग तज़्क़िरे[6] करते हैं अपने लोगों के मैं कैसे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे मगर वो ज़ूदफ़रामोश[7] ज़ूद-रंज[8] भी है कि रूठ जाये अगर …

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो / फ़राज़

11/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चालो तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत …

ऐसे चुप हैं के ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे तेरा मिलना भी जुदाई कि घड़ी हो जैसे अपने ही साये से हर गाम[1] लरज़[2] जाता हूँ रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं अपने ही पावों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे तेरे माथे की शिकन [3]पहले …

एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ? / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ? मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते ? मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने, आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते ? साया हूँ तो साथ ना रखने कि वज़ह क्या ‘फ़राज़’, पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते ?

उसने कहा सुन / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

उसने कहा सुन अहद निभाने की ख़ातिर मत आना अहद निभानेवाले अक्सर मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं तुम जाओ और दरिया-दरिया प्यास बुझाओ जिन आँखों में डूबो जिस दिल में भी उतरो मेरी तलब आवाज़ न देगी लेकिन जब मेरी चाहत और मेरी ख़्वाहिश की लौ इतनी तेज़ और इतनी ऊँची …

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़ ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी उससे …

अल्मिया / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

अल्मिया[1] किस तमन्ना [2]से ये चाहा था कि इक रोज़ तुझे साथ अपने लिए उस शहर को जाऊँगा जिसे मुझको छोड़े हुए,भूले हुए इक उम्र[3]हुई हाय वो शहर कि जो मेरा वतन है फिर भी उसकी मानूस[4]फ़ज़ाओं [5]से रहा बेग़ाना[6] मेरा दिल मेरे ख़्यालों[7]की तरह दीवाना[8] आज हालात का ये तंज़े-जिगरसोज़ [9]तो देख तू मिरे …

इज़्हार / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

इज़्हार[1] पत्थर की तरह अगर मैं चुप रहूँ तो ये न समझ कि मेरी हस्ती[2] बेग़ान-ए-शोल-ए-वफ़ा[3] है तहक़ीर[4] से यूँ न देख मुझको ऐ संगतराश[5]! तेरा तेशा[6] मुम्किन[7] है कि ज़र्बे-अव्वली[8] से पहचान सके कि मेरे दिल में जो आग तेरे लिए दबी है वो आग ही मेरी ज़िंदगी है शब्दार्थ: ↑ अभिव्यक्ति ↑ अस्तित्व …

आँख से दूर न हो / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दो मरने वाला तो …

अब के बरस भी / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

लब[1] तिश्न-ओ-नोमीद[2] हैं हम अब के बरस भी ऐ ठहरे हुए अब्रे-करम[3] अब के बरस भी कुछ भी हो गुलिस्ताँ[4] में मगर कुंजे- चमन [5] में हैं दूर बहारों के क़दम अब के बरस भी ऐ शेख़-करम[6]! देख कि बा-वस्फ़े-चराग़ाँ[7] तीरा[8] है दरो-बामे-हरम[9] अब के बरस भी ऐ दिले-ज़दगान[10] मना ख़ैर, हैं नाज़ाँ[11] पिंदारे-ख़ुदाई[12] पे …

अजब जूनून-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

अजब जूनून-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था, ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था, ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया, अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र से निकला था, ये तीर दिल में मगर बे-सबब नहीं उतरा, कोई तो हर्फ़ लब-ए-चारागर से निकला था, मैं रात टूट के रोया तो चैन से …

हर्फ़े-ताज़ा की तरह क़िस्स-ए-पारीना / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

हर्फ़े-ताज़ा की तरह क़िस्स-ए-पारीना कहूँ कल की तारीख़ को मैं आज का आईना कहूँ चश्मे-साफ़ी से छलकती है मये-जाँ तलबी सब इसे ज़हर कहें मैं इसे नौशीना कहूँ मैं कहूँ जुरअते-इज़हार हुसैनीय्यत है मेरे यारों का ये कहना है कि ये भी न कहूँ मैं तो जन्नत को भी जानाँ का शबिस्ताँ जानूँ मैं तो …

तेरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

तेरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जलवागरी रही कि जो रौशनी तेरे जिस्म की थी मेरे बदन में भरी रही तेरे शहर से मैं चला था जब जो कोई भी साथ न था मेरे तो मैं किससे महवे-कलाम1 था ? तो ये किसकी हमसफ़री रही ? मुझे अपने आप पे मान था कि न जब …

अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी इक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी मैं भी शहरे-वफ़ा में नौवारिद वो भी रुक रुक के चल रही है अभी मैं भी ऐसा कहाँ का ज़ूद शनास वो भी लगता है सोचती है अभी दिल की वारफ़तगी है अपनी जगह फिर भी कुछ एहतियात सी है अभी …

अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नजर आते हैं / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नजर आते हैं मुझको मालूम ना था ख्वाब भी मर जाते हैं जाने किस हाल में हम हैं कि हमें देख के सब एक पल के लिये रुकते हैं गुजर जाते हैं साकिया तूने तो मयखाने का ये हाल किया रिन्द अब मोहतसिबे-शहर के गुण गाते हैं ताना-ए-नशा …

संगदिल है वो तो क्यूं इसका गिला मैंने किया / फ़राज़

04/07/2012 | श्रेणी में प्रकाशित अहमद फ़राज़

संगदिल है वो तो क्यूं इसका गिला मैंने किया जब कि खुद पत्थर को बुत, बुत को खुदा मैंने किया कैसे नामानूस लफ़्ज़ों कि कहानी था वो शख्स उसको कितनी मुश्किलों से तर्जुमा मैंने किया वो मेरी पहली मोहब्बत, वो मेरी पहली शिकस्त फिर तो पैमाने-वफ़ा सौ मर्तबा मैंने किया हो सजावारे-सजा क्यों जब मुकद्दर …

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