Author: विजय कुमार सिंह

इन्तजार

चमन ने बहार से पूछा कब तलक आओगी तय वक़्त गुजर गया अब कितना सताओगी उम्र गुजरी जन्म गुजरे गुजरगयी ख्वाहिशें गर्द तलाश रही है क्या अपना पता बताओगी. …

हिंदी दिवस

मुक्त करो जंजीरों से हे व्यवस्था के सरदारों मैं हूँ हिंदी मातृभाषा मेरा रूप मिलकर संवारों घर के तिरष्कारों ने पराया बना दिया मुझको जागो युवाओं अब तुम ही …

समृद्धि

पहले मन को धोइये फिर घर-आँगन द्वार मधुर वचन बोलिये तजिये रूखा व्यवहार पावन मन से सजेगा घर-परिवार देश-समाज लक्ष्मी स्वयं ही आएँगी करेंगी समृद्ध अपार. विजय कुमार सिंह …