Author: डॉ. विवेक

नव वर्ष मंगलमय हो (डॉ.विवेक कुमार)

जन-जन के घर-आँंगन में सुख का सूर्योदय हो, मिटे गरीबी और अशिक्षा सच्चाई की जय हो। जन-जन के उर सिंधु में प्रेम-प्रीत लहराए, रोग-शोक का नाम नहीं हो सुख …

धूप छाँव (डॉ.विवेक कुमार)

धूप छाँव है आज मुझमें सामर्थ्य खड़ा हूँ पैरों पर अपने इसलिए तुम रोज ही आते हो मेरे घर मेरा हालचाल पूछने। बाँधते हो तारीफों के पुल आज बात-बात …

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…(डॉ. विवेक कुमार )

क्या रहस्य है यह आखिर क्यों हो जाता है बेमानी और नागफनी-सा दिन तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हो जाती है उदास मेरी तरह घर की दीवारें-सोफा मेज …

कुछ नहीं कर पाएंगे (डॉ. विवेक कुमार)

आज, तोड़े जा रहे हैं पहाड़ अंधाधुंध काटे जा रहे हैं पेड़ किये जा रहे हैं विज्ञान के नित नए आविष्कार। धरती के गर्भ को भी क्षत-विक्षत करने का …

जले होलिका नफरत की …(डॉ. विवेक कुमार)

अबकी बार इस होली में चले प्रेम की पिचकारी, राधा के गहरे रंग से रंग दें दुनिया सारी। जले होलिका नफरत की मिटे आपस की दूरी, वृन्दावन हो मन …

नव वर्ष (डॉ. विवेक कुमार)

नव वर्ष जीवन में सबके सुख-समृद्धि का वास हो नव वर्ष सच में सबके लिए खास हों। जन-जन के मन से अहंकार-बुराई का नाश हो, प्रेम बढ़े, द्वेष मिटे …

राम-लखन-सा मन हो -डॉ.विवेक कुमार

मिटे अँधेरा अन्तर्मन का शुभ्र-प्रकाश हो जीवन में, सुख समृद्धि और शांति रहे हमेशा आँगन में। ज्ञान-विवेक-प्रकाश से हरा-भरा जन-मन हो, मिटे बुराई-ईर्ष्या-नफरत राम-लखन-सा मन हो। सपने सबके सब …

छोटी-सी-जगह (डॉ. विवेक कुमार)

छोटा-सा एक रास्ता जो जाता तुम्हारे दिल तक और लौटता मेरे दिल से होकर l चाहता हूँ – इस रास्ते के सहारे पहुँचूँ तुम्हारे दिल के किसी कोने तक …

केवल आदमी

कितना अच्छा हो आदमी – जात-पात धर्म-मजहब मन्दिर-मस्जिद आदि बंधनों से पूर्णत: मुक्त हो। कितनाअच्छा हो आदमी नहीं हो – चोर-लुटेरा खूनी-डाकू तस्कर-हत्यारा नेता अभिनेता अमीर-गरीब अच्छा-बुरा। आदमी – …

बहुत दिनों के बाद…

आया है मनभावन मौसम बहुत दिनों के बाद बहुत इंतजार के बाद… आये हैं ढेर सारे फूल बूढ़ी काकी के अमरूद के गाछ में… आये हैं दो छोटे-छोटे चमकीले …

कभी-कभी (डॉ. विवेक कुमार)

कभी-कभी कभी-कभी किसी के इकरार और इनकार में टिकी होती है हमारे सपनों की गगनचुंबी इमारत. टिकी होती है हमारे जीने की सारी उम्मीदें और काफी हद तक प्रभावित …

आया नया विहान (डॉ. विवेक कुमार)

राम राज सा धरा-धाम हो कान्हा का रंग-रास, डाल-डाल पर फूल खिले रहे सदा मधुमास। राग-द्वेष-घृणा हटे बहे प्रेम की गंगा, रहे नहीं अवसाद धरा में मन हो सबका …

आया नया विहान (डॉ. विवेक कुमार)

राम राज सा धरा-धाम हो कान्हा का रंग-रास, डाल-डाल पर फूल खिले रहे सदा मधुमास। राग-द्वेष-घृणा हटे बहे प्रेम की गंगा, रहे नहीं अवसाद धरा में मन हो सबका …

कभी-कभी (डॉ. विवेक कुमार)

कभी-कभी किसी के इकरार और इनकार में टिकी होती है हमारे सपनों की गगनचुंबी इमारत. टिकी होती है हमारे जीने की सारी उम्मीदें और काफी हद तक प्रभावित होती …

सूरज तुम पलायन नहीं कर सकते…

मैं जानता हूँ सूरज कि तुम संशय और समस्याओं से आँखे चुराकर स्वयं को असत्य रूपी अंधकार के हवाले कभी नहीं कर सकते क्योंकि तुम जानते हो कि सत्यप्रकाश …