Author: PATHAK JEE

कुछ समझ जाते हैं कुछ समझ नहीं पाते

तेरी नाराजगी,मेरे अल्फ़ाज़ भी नहीं मिटा पाते हम चाहते हैं कितना तुझको यह मेरे आंसू भी नहीं बता पाते घड़ी घड़ी रह रह कर देखता हूं मैं उन्हीं बीरान …

एक सख्स

एक सख्स है जो नाराज भी नहीं है मगर पहले जैसा भी नहीं है गुमसुम सा है कुछ कहता भी नहीं है मैं पूछूं भी तो क्या पूछूं उससे …

हैं दोनो ही इंसान

मै मुसलिम हूँ, तू हिन्दू हैं ………..हैं दोनो इंसान ला मै तेरी गीता पढ लूँ , तू पढ ले मेरी कुरान ना मैने अपना अल्लाह देखा ना देखा तूने …

लिखू मै भी कुछ

लिखू मै भी कागज पर, जो हाथों की लकीर बन जाये गुन गुनाऊँ ऐसा तराना जो मेरी तकदीर बन जाये कलम की श्याही ख्वाव बने कागज की पट्टी विशबास …