Author: विनय कुमार

सूरज इतना लाल हुआ

जाने क्या हो गया, कि सूरज इतना लाल हुआ। प्यासी हवा हाँफती फिर-फिर पानी खोज रही सूखे कण्ठ-कोकिला, मीठी बानी खोज रही नीम द्वार का, छाया खोजे पीपल गाछ …

मेरा भी तो मन करता है

मेरा भी तो मन करता है मैं भी पढ़ने जाऊँ अच्छे कपड़े पहन पीठ पर बस्ता भी लटकाऊँ क्यों अम्मा औरों के घर झाडू-पोंछा करती है बर्तन मलती, कपड़े …

माँ

माँ कबीर की साखी जैसी तुलसी की चौपाई-सी माँ मीरा की पदावली-सी माँ है ललित रूबाई-सी। माँ वेदों की मूल चेतना माँ गीता की वाणी-सी माँ त्रिपिटिक के सिद्ध …

पीपल की छाँव

पीपल की छांव निर्वासित हुई है और पनघट को मिला वनवास फिर भी मत हो बटोही उदास प्रात की प्रभाती लाती हादसों की पाती उषा किरन आकर सिंदूर पोंछ …

पिउ पिउ न पपिहरा बोल

पिउ पिउ न पिपहरा बोल, व्यथा के बादल घिर आएंगे होगी रिमझिम बरसात पुराने ज़ख्म उभर आएंगे।। आंखों के मिस दे दिया निमंत्रण मुझे किसी ने जब से सुधियों …

न जाने क्या होगा

सिमट गई सूरज के रिश्तेदारों तक ही धूप न जाने क्या होगा घर में लगे उकसने कांटे कौन किसी का क्रंदन बांटे अंधियारा है गली गली गुमनाम हो गई …

चिड़िया और बच्चे

चीं-चीं, चीं-चीं, चूँ-चूँ, चूँ-चूँ भूख लगी मैं क्या खाऊँ बरस रहा बाहर पानी बादल करता मनमानी निकलूँगी तो भीगूँगी नाक बजेगी सूँ-सूँ, सूँ चीं-चीं, चीं-चीं, चूँ-चूँ चूँ ……. माँ …

ग्यारह दोहे

आहत है संवेदना, खंडित है विश्वास। जाने क्यों होने लगा, संत्रासित वातास।। कुछ अच्छा कुछ है बुरा, अपना ये परिवेश। तुम्हें दिखाई दे रहा, बुरा समूचा देश।। सब पर …

गिलहरी

गिलहरी दिन भर आती-जाती फटे-पुराने कपड़े लत्ते धागे और ताश के पत्ते सुतली, कागज, रुई, मोंमियाँ अगड़म-बगड़म लाती। गिलहरी दिनभर आती-जाती।। ठीक रसोईघर के पीछे शीशे की खिड़की के …

आहत युगबोध

आहत युगबोध के जीवंत ये नियम यूं ही बदनाम हुए हम ! मन की अनुगूंज ने वैधव्य वेष धार लिया कांपती अंगुलियों ने स्वर का सिंगार किया अवचेतन मन उदास …

अहिंसा के बिरवे

चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ ! बहुत लहलही आज हिंसा की फसलें प्रदूषित हुई हैं धरा की हवाएँ। चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।। बहुत वक़्त बीता कि जब …

मेरे पास था एक शक्ति शाली गुलेल

मेरे पास था एक शक्ति शाली गुलेल दूर तक पत्थर फेंकने का खेल रहा था खेल खेलते खेलते महारत हासिल कर बहुत मैं ऐंठा प्रकृति से हुआ दण्डित जब …

बचपन में मैं रोता था

बचपन में मैं रोता था खूब चिल्ला-चिल्ला कर रोता था माँ-बाप, चाचा-चची, भाई-बहन सबका खूब प्यार हासिल करता था हाँ, मैं जानबूझ कर रोता था अब भी मैं रोता …

पचास पार कर लिए अब भी इंतज़ार है

पचास पार कर लिए अब भी इंतज़ार है मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है गुरुर टूटने पे ही समझ सका सच्चाई को जो है तो बस खुदा …

नाम में अक्सर मजहब का ज़िक्र होता है

नाम में अक्सर मजहब का ज़िक्र होता है मेरा नाम जगदीश यानी हिन्दू उसका नाम अशरफ था, ज़ाहिरन मुसलमान था मैंने आदाब कहा उसने नमस्कार हम दोनों के लिबाज़ …