Author: शहरयार 'शहरी'

परदेसी बालम धन अकेली मेरा बिदेसी घर आवना

परदेसी बालम धन अकेली मेरा बिदेसी घर आवना। बिर का दुख बहुत कठिन है प्रीतम अब आजावना। इस पार जमुना उस पार गंगा बीच चंदन का पेड़ ना। इस …

दैया री मोहे भिजोया री शाह निजम के रंग में।

दैया री मोहे भिजोया री शाह निजाम के रंग में। कपरे रंगने से कुछ न होवत है या रंग में मैंने तन को डुबोया री पिया रंग मैंने तन …

तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम

तोरी सूरत के बलिहारी, निजाम, तोरी सूरत के बलिहारी । सब सखियन में चुनर मेरी मैली, देख हसें नर नारी, निजाम… अबके बहार चुनर मोरी रंग दे, पिया रखले …

ढकोसले या अनमेलियाँ

भार भुजावन हम गए, पल्ले बाँधी ऊन। कुत्ता चरखा लै गयो, काएते फटकूँगी चून।। काकी फूफा घर में हैं कि नायं, नायं तो नन्देऊ पांवरो होय तो ला दे, …

जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या

जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या जो मैं जानती बिसरत हैं सैय्या, घुँघटा में आग लगा देती, मैं लाज के बंधन तोड़ सखी पिया प्यार को अपने मान लेती। …

काहे को ब्याहे बिदेस

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस भैया को दियो बाबुल महले दो-महले हमको दियो परदेस अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस …

अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई

अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई, जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई। छाप तिलक सब छीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के, बात …

बसन्त पंचमी पर निराला-स्मृति

था यहाँ बहुत एकान्त, बंधु नीरव रजनी-सा शान्त, बंधु दुःख की बदली-सा क्लान्त, बंधु नौका-विहार दिग्भ्रान्त, बंधु ! तुम ले आये जलती मशाल उर्जस्वित स्वर देदीप्य भाल हे ! कविता के …

मुझे याद आई धरती की

मुझे याद आई धरती की। मैनें देखा, मैनें देखा क्षीणकाय तरुणी, वृद्धा सी लुंचित केश, वसन मटमैले, निर्वसना सी घुटनों को बाँहों में कस कर देह सकेले मुझे याद …

स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं कुछ उजले कुछ धुंधले-धुंधले

स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं कुछ उजले कुछ धुंधले-धुंधले। जीवन के बीते क्षण भी अब कुछ लगते है बदले-बदले। जीवन की तो अबाध गति है, है इसमें अर्द्धविराम …

सपनों को कल रात जलाया

सपनों को कल रात जलाया हर करवट पर चुभते थे जो घुटन बढ़ाते घुटते थे जो मुझे पीसते पिसते थे जो रोते कभी सिसकते थे जो मन पर भारी …

रिश्तों का व्याकरण

अनुकरण की होड़ में अन्तःकरण चिकना घड़ा है और रिश्तों का पुराना व्याकरण बिखरा पड़ा है। दब गया है कैरियर के बोझ से मासूम बचपन अर्थ-वैभव हो गया है …

रात्रि के अंन्तिम प्रहर तक तुम न मुझसे दूर जाना

रात्रि के अंन्तिम प्रहर तक तुम न मुझसे दूर जाना। आज होठों पर तेरे लिखना है मुझको इक तराना। कौन जानें कल हवा अलकों से छन कर मिल न …

मैं अजन्मा, जन्मदिन किसका मनाऊँ

मैं अजन्मा, जन्मदिन किसका मनाऊँ? पंचभूतों के विरल संघात का? क्षरित क्षण-क्षण हो रहे जलजात का? दो दिनो के ठाट मृण्मय गात का या जगत की वासना सहजात का? …

रीति अगर अवसर देती तो हमनें भाग्य संवारा होता

प्रीति अगर अवसर देती तो हमनें भाग्य संवारा होता। कमल दलों का मोह न करते आज प्रभात हमारा होता। नीर क्षीर दोनों मिल बैठे बहुत कठिन पहचान हो गई, …