Author: Shishir "Madhukar"

बजते नहीं अब साज – शिशिर मधुकर

आती नहीं आवाज़ कोई मेरे दिल से बाहर आज सूनी पड़ी है ज़िन्दगी और बजते नहीं अब साज महफिल उजाड़ कर जो समझते हैं खुद को वीर ऐसे कमजर्फ …

नैन पर फिर भी मिल गए – शिशिर मधुकर

छुपाया बहुत खुद को नैन पर फिर भी मिल गए असर ऐसा हुआ दिल पे फूल खुशियों के खिल गए खौफ ने इस कदर घोला है ज़हर फ़िज़ा में …

ख़ता मेरी ही थी- शिशिर मधुकर

तेरी तन्हाइयों में मैंने कभी तेरा साथ ना छोड़ा काश इस बात का एहसास कर लेते तुम ही थोड़ा जिस कदर तूने मुँह फेरा है भुला के प्रीत के …

प्रेम धागे का बंधन – शिशिर मधुकर

तेरे बिन दिन नहीं कटते तुझे कैसे बताएं हम तू ही जब पास ना आए तुझे कैसे सताएं हम तेरा वो रूठ जाना और मनाना याद आता है समझ …

गुजर गया अब के ये सावन -शिशिर मधुकर

गुजर गया अब के ये सावन बिना कोई बरसात हुए सब शिकवे हमने कह डाले बिन तेरी मेरी बात हुए प्यार लुटा के बैरी होना सबके बस की बात …

बस तेरे लब के बोसे हैं – शिशिर मधुकर

मुहब्बत खुशियाँ देती है मगर ग़म भी परोसे है ये मुस्कान जानेमन बस अब एक तेरे भरोसे है भिगो देता है ये सावन जब भी मुझको हौले से यूँ …

वो लम्हें निकल गए – शिशिर मधुकर

जिनमें सुकूं मिला मुझे वो लम्हें निकल गए सपनों के सभी आशियां धू धू हो जल गए चट्टान सा मिला ना मुझे रिश्ता कोई यहाँ मौसम गर्म हुआ तो …

समझो पीड़ा (हाइकु)- शिशिर मधुकर

भीषण बाढ़ धरती कराहती समझो पीड़ा। बरखा आए मयूर छुप गए चैन कहीं ना। राह कांटों की मुश्किल है चलना छलनी सीना। फूल खिले है चिड़ियाएं उड़ती संग में …

किस्मत के उलट फेरे – शिशिर मधुकर

मुहब्बत दिल में हो जिनके वो ही तो मान करते है मिटा के जिस्मों की दूरी उनको एक जान करते हैं उम्मीदें मैंने पाली थी नाज़ बन माथे पे …

फिर सो ना सका – शिशिर मधुकर

मैंने सोचा बहुत मैं भुला दूँ तुम्हें लेकिन ये मुझसे हो ना सका तेरी छवियां ना दिखला दें आंसू मेरे मैं तो जहाँ में रो ना सका उल्फ़त की …

नेतागिरी के अड्डे – शिशिर मधुकर

मुंबई की मोटर साइकिल सवार गड्डे में फिसल गई दिल्ली के अनिल गुप्ता की जान नाले में निकल गई नगर निगमों की लापरवाही पर जनता बहुत नाराज़ है खुलकर …

सेना सदा महान है – शिशिर मधुकर

सेना सदा महान है उससे ही हिन्दुस्तान है लेकिन हमारी कमज़ोरियों से बढ़ती ना उसकी शान है जब भी कोई सैनिक अपना शहीद होता है हर नागरिक का मन …

तेरी चाहतों के जैसा – शिशिर मधुकर

चाहा बहुत ना दिल से तुझे दूर कर सके भूलूँ तुम्हें ना वो मुझे मजबूर कर सके आनंद वो मैंने पा लिया जिसकी तलाश थी बाकी नशे ना मुझको …

बदलते वक्त में -शिशिर मधुकर

क्या करूँ मैं तुम ही बोलो मेरा दिल तुमने तोड़ा है कहाँ ढूँढू सकूँ जब तेरे लिए ज़माने भर को छोड़ा है धारा रोक देने से नदिया घुट घुट …

राष्ट्र की खातिर- शिशिर मधुकर

एक मेरे मित्र हैं जो मुझसे बहुत नाराज़ हैं उनको पसंद आते ना मेरे मलमली अल्फ़ाज़ हैं राष्ट्र की खातिर वो कहते हैं की मैं रचना लिखूं एक भारत …

कुमकुम बना के – शिशिर मधुकर

कोई सागर नहीं ऐसा ना जिसमें ज्वार आते हों वो लोचन ना आशिक के जो ना अश्रु बहाते हों ऐसी चाहत ज़माने में कभी भी सुख ना देती है …