Author: SARVESH KUMAR MARUT

गुब्बारों का लगा है मेला

गुब्बारों का लगा है मेला। एक रुपए में ले लो जैसा। लाल,गुलाबी,नीला,पीला। पैसे लेकर दौड़ी शीला। माँग लिया गुब्बारा नीला। इधर से डोला- उधर से डोला। श्यामू,चिंटू,सीता,लीला। खेल सभी …

हे मातृभूमि! तेरी ख़ातिर

हे मातृभूमि! तेरी ख़ातिर,             लेकर यह अभियान चले। अपनी जान हथेली पर हम,             तुझ पर होने बलिदान चले। हम घट-घट के वासी हैं,             जो भी नज़र …

शेर शायरी

हर कोई वेग़ाना है, सभी का अपना अपना फ़साना है। उलझते जा रहे फ़ासलों क्यों? ये वन्दा कुछ दीवाना है। ज़िन्दगी जीना चाहते हैं, ख़्वाहिशों का आशियां है। रुक …

पैसा

पैसा संसार में भीहड़ है कितनी, और रूप भी है कैसा-कैसा? संसार लगे छोटा अब तो, क्योंकि बड़ा जुड़ा यहां पैसा। संसार तुच्छ है इसके बिन, चला यहां है …

सच्चाई अब डूब चुकी

सच्चाई अब डूब चुकी है, न जाने उनकी आँखों से। डुबा दिया देखो हम सबको, न जाने क्यों अपने हालातों से। जख़्म दिया ऐसा जिसने, उसने क्यों अपनी बातों …

कैसा खेल यह तूने खेला है ?

कैसा खेल यह तूने खेला है? लगा दिया यहाँ रेला है। छायी हर तरफ उदासी है, और लगा दिया तूने मेला है। हम आँखों में उम्मीद लगाये, ढूँढे ऐसा …

मैं पत्थर की मूरत हूँ

मैं पत्थर की मूरत हूँ! फिर क्यों मुझे बुलवाते हो? तुमने क्या कहा मैंने क्या सुना?, हम तो अनभिज्ञ है इससे। ना तो पत्थर बोले- ना ही बोले मूरत, …

नारी

देखो आती है कैसे?,अपने हाथों में बारी। लड़ने को तैयार हो चुकीं,देखो अब हम सब नारी। जाग गयीं और जाग चुकीं हैं,अपने अत्याचारों को लेकर ,सुलगाई अब यह चिंगारी। …

“मैं पानी की बूँद हूँ छोटी”

मैं पानी की बूँद हूँ छोटी, मैं तेरी प्यास बुझाऊँ। पी लेगा यदि तू मुझको , मैं तुझको तृप्त कराऊँ। मैं छोटी सी बूँद हूँ, फ़िर क्यों न पहचाने? …