Author: sanjay kumar maurya

अपराध…………

हिरणी की जैसी दो नेत्र उपर दूज की चांद की आकृति बनाता काली नुकीली दो भौहें उभरा चमकमता ललाट एक लंबा उॅचा नाक गुलाब की पंखुड़ी सी सुघड़ कपोल …

गा रहा हूं

जैसे भंवरा कोई भ्रमण करता उपवन उपवन गूंजन का मधुर स्वर बिखराता फिरता बर्तन मांजने से चमकता है विवेक अध्ययन से प्रेम आभास व विश्वास से सब पीछे छूट …

दर्पन मत देखो

नहीं तुम दर्पन मत देखो मुझे पता है दर्पन चाहता है तुम्हे देखना वह देख लेगा तुमको स्वयं में उतारकर बस एक बार निहारकर एकदम वैसे ही जैसे तुम्हे …

अकेली नहाती लड़की

भीषण ग्रीष्म धरती छूकर जलते पैर बड़ी कठीनाई से पहुचता था बिना चप्पलों के तालाब के किनारे उस पेड़ के नीचे । एक गौरैया गर्मी से बेहाल किनारे पानी …

मेरे वो गम पुराने हो नहीं पाये

मेरे वो गम पुराने हो नहीं पाये चैन से हम अभी तक सो नहीं पाये यों सफर चलते हुए छिंटे लगे थे कि कोशिशें लाखों किये पर धो नहीं …

प्रकृति प्रेम

लहलहाते फसल सिंचता किसान सरसो की बसंती फूल कलेवा ले जा रही औरत और उसके कदमों की मंथर मंथर चाल उसकी पायल की रुनझुन से उत्पन्न हो रहे थे …

जिंदगी हर किसी की

जिंदगी हर किसी की मिल जाती है कहानी में वो आदमी भी सिकन्दर था कभी जवानी में पहचानने से बज्म में इन्कार करता है उसे खत वो अनगिनत जिसकी …

कोल्हू

माघ का हाड़ में कंपन मचाने वाला माह कांपता किसान उन के फटे चिथड़ों में, अनवरत दौड़ता कोल्हू के चारो ओर जोड़ीदार बैलों के पीछे रुकता नहीं कदापि संभवत: …