Author: रै कबीर

घङी की सूईयां ……(रै कबीर)

काश दौङा सकता उलटा इन घङी की सुईयों को और खींच लाता वो पल फिर से, जब मिला तुम्हारा आखिरी संदेश कि तुमसे मिलकर अच्छा लगा और अब अलविदा …

तमाशा……(रै कबीर)

तेरा जानबूझकर मेरे पास से खामोश निकलना और दूर खङे होकर फिर से निहारना कहाँ से लाती हो इतनी सहनशीलता मेरा तो सरेआम तमाशा करने का दिल करता है।। …

देर रात के मैसेज से परेशान…….(रै कबीर)

हाले दिल बयां में काहे की शरम जरा तुम भी दिल कोे रखो नरम हाल ही पूछा कोई कत्ल ना छोरी क्यूँ बिन बात कै न्यूं बावली होरी माना …

छिड़ी बहस इक बात पर……. (रै कबीर)

छिड़ी बहस इक बात पर धूम मचाई रात भर।। बीवीजी गुस्से में लाल देखके हो गया बुरा हाल।। पहले मैंने बात पकाई कि घर में किसने आग लगाई।। बीवीजी …

अंकल के भेष में है शैतान…..(रै कबीर)

देख नारी ! सुन ! ऐ बिटिया सुरक्षित नहीं है अब ये दुनिया।। बैठा जो तेरे घर में इंसान नहीं !नहीं! वो है हैवान।। रहम ना उसको आएगा तुझे …

“पाश” (रै कबीर)

प्रेमपाश दे तेरे शब्दों से मुझे अंकपाश दे तेरे शब्दों से मुझे गुलाबपाश दे तेरे शब्दों से मुझे नागपाश दे तेरे शब्दों से मुझे स्नेह मिलेगा लगन मिलेगी महक …

प्र का प्रभाव ….. (रै कबीर)

प्रवचन प्रवाह में प्रवेश मेरा प्रति प्रति प्रफुल्ल हुआ प्राप्त प्रचलित प्रकाश मेरा प्रेम प्रभाव प्रबल हुआ प्रलय से प्रस्थान मेरा प्रीत प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ प्रात: प्राण प्रभास मेरा …

इमारत !!! (रै कबीर)

है कैसी हमनें इमारत बनाई क्रोध में तपी ईंट लगाई रक्त से सींचा नींव को इसकी मरी आत्मा आंगन दफनाई भेदभाव की चारदीवारी ईर्ष्या भाव से की चिणाई क्लेश …

परीक्षा सी है तूं…. (रै कबीर)

तूझे मिटा नहीं सकता उभरे अक्षरों सी है तूं सच्ची है मोहब्बत की लिखावट मेरी उस पर पक्की स्याही है तूं शब्द मात्र मजबूर कर दे ऐसी कविता का …