Author: rakesh kumar

बेगैरत

आबरू मेरी चाहतों की रोज ही लुटती है तमन्नाओं के तकिये पर सपने रोज सिसकते हैं | मुक़द्दस्त मालिक हो गया देखो ये जहां मेरा मुझे उधर घूमाते हैं …

समां

आते तो हैं लोग मिलने को मुझे मुस्कुराहटों से अपनी छलने को मुझे कहते हैं समां हूँ जिन्दगी की उनकी छोड़ देते हैं दरवाजों पर पिघलने को मुझे

सादगी

उड़ते बाल जब चेहरे पर आ जाते है लहराती हैं हवाऐ पर्वत गीत गाते हैं | पलकें आपकी तो हया बहुत लुटाती हैं काले बादलों में जैसे मेघ घनघनाते …

बेरूप

हे मालिक हमने क्या गुनाह किया क्यूँ हमें खूबसूरत बना दिया तेरे इस रूप ने उस रूप को छिपा दिया जिसे पूजता है इंसानियत का दिया रूपों के तेरे …

मिसाल

सारा जहान तुझमें, तू क्यूँ भटक जाता है खुले आसमान का पंछी क्यूँ अटक जाता है कोई ख़ुशी बाहर नहीं है तुझसे चल संम्भल क्यों तू मचल जाता है …

दोहन

कायाकल्पित किंगरों से अब युद्ध नहीं होगा दूध और फूल चढाकर शिव अभिषेक नहीं होगा ना कोई समभाव प्रबल कोई कबूतर सफ़ेद नहीं होगा ना मंजूर अत्याचार दखल कोई …

दूर करके

हे मुरलीधर,हे मनोहर मेरे अधर तुझे बुलाते हैं कचोट रहे कलयुग में मुझको जो तेरा मज़ाक उड़ाते हैं हे चितचोर ,बांके बिहारी चोरी का इल्जाम लगाते हैं ये अंधे …