Author: rakesh kumar

सादगी

उड़ते बाल जब चेहरे पर आ जाते है लहराती हैं हवाऐ पर्वत गीत गाते हैं | पलकें आपकी तो हया बहुत लुटाती हैं काले बादलों में जैसे मेघ घनघनाते …

बेरूप

हे मालिक हमने क्या गुनाह किया क्यूँ हमें खूबसूरत बना दिया तेरे इस रूप ने उस रूप को छिपा दिया जिसे पूजता है इंसानियत का दिया रूपों के तेरे …

मिसाल

सारा जहान तुझमें, तू क्यूँ भटक जाता है खुले आसमान का पंछी क्यूँ अटक जाता है कोई ख़ुशी बाहर नहीं है तुझसे चल संम्भल क्यों तू मचल जाता है …

दोहन

कायाकल्पित किंगरों से अब युद्ध नहीं होगा दूध और फूल चढाकर शिव अभिषेक नहीं होगा ना कोई समभाव प्रबल कोई कबूतर सफ़ेद नहीं होगा ना मंजूर अत्याचार दखल कोई …

दूर करके

हे मुरलीधर,हे मनोहर मेरे अधर तुझे बुलाते हैं कचोट रहे कलयुग में मुझको जो तेरा मज़ाक उड़ाते हैं हे चितचोर ,बांके बिहारी चोरी का इल्जाम लगाते हैं ये अंधे …

रहता है वहां एक

बहुत थोड़ा है मेरा सामान देखिए जेबों में पड़े अरमान देखिए कूबत न हो बेशक इबादत की टूटता नहीं मेरा ईमान देखिए दिल को दुखाकर मुस्काता मैं नहीं दुखों …