Author: rakesh kumar

गुनेहगार

तेरी उन गलियों में ,जाना बेकार ही सही फिर करके देखेगें ,झूठा इंतजार ही सही माना नहीं रहे निशान चाहतों के कूचों पर फिर भी गुजरेंगे, बनकर तेरे गुनेहगार …

नारी

बनाने को संगमरमरी मूरत जाने कितनी चोंटे खाती हो चलकर अंगारों पर भी तुम मन्द मन्द मुस्काती हो पोषित करती दूध रक्त से अंग प्रत्यंग बनाती हो सुकोमल प्रेम …

अन्तर्यामी

तेरी धुन बिन सृष्टि बहुत प्यासी तुझे नाम क्या दूँ घट-घट वासी | नीतिनिधान हे रथचालक करुणावतार, प्रभु प्रतिपालक | मीरा मोह तुझपर हारी हे मोर मुकुट बंशीधारी | …

आकर देखो इन ‘वन’ में

भीतर किसी तरुणाई पर खग मृग अकुलाते हैं इनके घने अंधेरों में गूंगे भी शोर मचाते हैं | निष्ठा भी अंगड़ाई लेती इनके हरे बिछौनों पर जाने कितने जाल …