Author: rakesh kumar

देश

1 कहने से कोई यूँ ही तलबगार नहीं होता शमशीर रखने से कोई पहरेदार नहीं होता फडकती हैं बाजुऐं जुनून सब जोश से बिना पसीना बहाऐ देश से प्यार …

गुनेहगार

तेरी उन गलियों में ,जाना बेकार ही सही फिर करके देखेगें ,झूठा इंतजार ही सही माना नहीं रहे निशान चाहतों के कूचों पर फिर भी गुजरेंगे, बनकर तेरे गुनेहगार …

नारी

बनाने को संगमरमरी मूरत जाने कितनी चोंटे खाती हो चलकर अंगारों पर भी तुम मन्द मन्द मुस्काती हो पोषित करती दूध रक्त से अंग प्रत्यंग बनाती हो सुकोमल प्रेम …