Author: प्रशान्त तिवारी

क्यूँ सोचूँ -प्रशान्त तिवारी

क्यूँ शांत रहा इतने दिन मैं इतना भी ऐसा विचरना क्या था , टाल दिया होता मत को पतझढ़ में बात बिगड़ना ही था। जो बोल रहे वो बोलेंगे …

आत्म-मंथन -प्रशान्त तिवारी

सूरज ढलने से पहले जब घोर अंधेरा होता है, भय लगता है मन में और बादल सा उमड़ जाता है। दूर दृष्टी से देखा जिसको नयनों ने पुलकित होकर, …

रावण का दर्द -प्रशान्त तिवारी

आज जले न जाने कितने रावण धूं-धूं कर के और सभी ने मांगी खुशियां सदा जो उनपे बरसे, क्या किसी ने फूंका अपने अंदर के रावण को, जो घूम …

आरक्षण -प्रशान्त तिवारी

आरक्षण ने तंज कसा है प्रतिभाओं के पंख कुतर कर, रोजी रोटी मिलना था पर हाथ धरे बैठे है घर पर, अन्य सदन पैदा जो होता कम से कम …