Author: Niharika Mohan

मैंने मयंक को देखा! – निहारिका मोहन

आज झरोखे से अचानक, मैंने, घूरते मयंक को देखा लालिमा से प्रेरित हुए गोलाकार प्रकृति-अंग को देखा, शान्ति-सैलाब लिए हुए कोहराम को करते भंग देखा; चंद्रिका से इसकी हर …

अकेली थी आयी धरा पर…

अकेली थी आयी धरा पर, मैं अकेली ही रहूंगी; थिरकती गुनगुनाती समा में एक मौन पहेली ही रहूँगी । परिवर्तन का झोंका बेहता सदा से, बहकाता हर मन को …

जूठन

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं, बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं… शोषण की आदत है पुराणी हो गयी सहलियाँ थीं कभी जो, सब बेगानी हो गयीं जिस्म …

मैं जल रही, तड़प रही, एक आग दिल में भड़क रही!

मैं जल रही, तड़प रही एक आग दिल में भड़क रही! उम्मीद सपने खो दिए, निराशा में हम रो दिए; सिन्दूर दूसरे का पहन मेरी कोई पहचान नहीं! मैं जल …