Author: के. एम. सखी

समन्‍दर का किनारा

उफनती लहर ने पूछा समन्‍दर के किनारे से निस्‍तेज से क्‍यूँ हो शान्‍त मन में क्‍या है तुम्‍हारे । समेटे हूँ अथाह सागर तीखा, पर गरजता है । छल, …

रेत के समन्‍दर में सैलाब

रेत के समन्‍दर में सैलाब आया है न जाने आज ये कैसा ख़्वाब आया है दूर तक साँय-साँय-सी बजती थी शहनाई जहाँ वहीं लहरों ने मल्‍हार आज गाया है …

मृगतृष्‍णा

एक मोटा चूहा मेरी ज़िन्‍द़गी को बार-बार कुतर रहा है अपने पैने दाँतों से । उसने मेरी ज़िन्‍दगी की डायरी को कुतर-कुतर के अपनी भटकती ज़िन्‍दगी का बदला लेना …

मर्यादा का मुखौटा

ये क्‍या है, जो मानता नहीं समझता नहीं समझना चाहता नहीं कुछ कहता नहीं कुछ कहना चाहता नहीं। तुम इसे गफ़लत का नाम दो मैं इसे मतलब का । …

क्‍या लिखूँ ?

भाव बहुत हैं, बेभाव है, पर उनका क्‍या करूँ तुम मुझे कहते हो लिखो, पर मैं लिखूँ किस पर समाज के खोखलेपन पर लोगों के अमानुषिक व्‍यवहार पर या …

उजियारे की डोर (कविता)

उजाले के समन्‍दर में गोते लगाकर मैंने अंधियारे मन को रोते देखा । जगमगाहट से लबरेज़ उस हवेली का हर कोना फटे-हाल भिखारी-सा, सजा-धजा-सा था । पर, मौन, नि:शब्‍द, …

पथ पे आयेंगे लोग जाने कब

पथ पे आयेंगे लोग जाने कब सर उठाएंगे लोग जाने कब आसुओं से उमड़ पड़े सागर मुस्कुराएंगे कोग जाने कब जख्म मुद्दत से गुदगुदाते हैं खिल्खिलायेंगे लोग जाने कब …

कुछ तो कमरे में गुजर होगा हवा का पागल

कुछ तो कमरे में गुजर होगा हवा का पागल खिडकियां खोल की है हब्स बला का पागल उसकी बकवास में होती है पते की बात कभी कर दे न …

बोझ ह्रदय पर भारी हो

बोझ ह्रदय पर भारी हो पर मुख पर उजियारी हो कुर्सी की टांगें न हिले जंग चले बमबारी हो अपना हिस्सा ले के रहे तुम सच्चे अधिकारी हो चम्बल …

अपने सीने में मेरा बिम्ब बराबर देखो

अपने सीनों में मेरा बिम्ब बराबर देखो दोस्तों ! मुझको अगर आईना बनकर देखो यह पहाड़ों के पिघलने का नतीजा तो नहीं पानी पानी हुआ जाता है समन्दर देखो कैसे …

शक्ल मेरी क्या चमकी

शक्ल मेरी क्या चमकी आपकी सभा चमकी गहरी कालिमा चमकी या मेरी दुआ चमकी ज्योति पा गई धरती बन के आईना चमकी मेरे जख्म क्या चमके आपकी अदा चमकी …

अग्नि शय्या पर सो रहे हैं लोग

अग्नि शय्या पर सो रहे हैं लोग किस कार्ड सर्द पड़ चुके हैं लोग तोडना चाहते हैं अमृत फल जहर के बीज बो रहे हैं लोग मंजिलों की तलाश …

आखों में भडकती हैं

आखों में भडकती हैं आक्रोश की ज्वालाएं हं लांघ गए शायद संतोष की सीमाएं पग पग पे प्रतिस्थित हैं पथ भ्रस्त दुराचारी इस नक़्शे में हम खुद को किस …