Author: kaushlendra

तुम्हारे पास देह था

शब्द जब थोथे लगने लगे तुमने देह इस्तमाल किया, गुरेज नहीं किया, शब्द उथले हो गए, देह वाचाल हो गए। देह को खुलने दिया, जहां तक जा सकती थी …

पहाड़ तुम बिल्कुल नहीं बदले,

वही रंग रूप वही शिखर, शिखर पर पेड़, चरणों में नदी। तुम्हारी लटों से खेलती झाड़ियां शैवाल, चीड़, भूरे भूरे काई लगे पेड़, सड़कें बलखाती किस मोड़ पर मुड़ …

रस्सी को क्या मालूम

रस्सी को क्या मालूम रस्सी को नहीं मालूम कि वो कहां बंधेगी किस खूंटे में गाय को थामेगी? उसे तो यह भी नहीं मालूम कि किस अलगनी में टंगेगी …

पेड़ तुम ठिगने हो गए हो

पेड़ तुम ठिगने हो गए, इमारतें लंबी हो गईं तेरी टहनियों की पत्तियां देखो मुरझा कर झरती जा रही हैं। पेड़ कब से तुम खड़े हो, घाम बरसात,सरदी की …

हस्ताक्षर

कई बार रूलाते हैं अपने ही हस्ताक्षर कई बार हंसाते हैं, अब देखिए जब ज्वाईनिंग पत्र पर करते हैं हस्ताक्षर और जब… क्या ही मंजर होता है, जब अपने …

मेरी ही कविताओं ने आज खिलाफत छेड़ दी

मेरी ही कविताओं ने आज खिलाफत छेड़ दी मेरे ही सामने खड़ी हो गईं तन कर, सवाल करती हैं पूछती हैं वो अनुभव किसका था जिसमें तुमने हमें डुबोया, …

दक्षिणभर बैठी बेचूआ की माई-

दक्षिणभर बैठी बेचूआ की माई- ताक रही है लगातार बरस बीते बरसात गई, घुरना जो गया लौटा नहीं। सुना है- उसकी एक सुन्नर पतोहू है, सेवा टहल करती, उमीर …

रिश्तों के पायदान पर

गठबंधन इन दिनांे लगा हूं समझने में रिश्तों का समीकरण रिश्तों की फुसफुसाहट गठबंधन संबंधों का। धीमे कदमों से चलता हूं रिश्तों के पायदान पर फिर कुछ आहटें कुछ …

तुम से मिलता हूं गोया जहां पूरा समा जाता हो

पहाड़ से मिलता हूं मिलता हूं जंगल से भी। जब भी गले लगाया किसी मोटे बिरिछ को तो लगा तुम्हीं में समा गया गोया। काले थे या गोरे रंग …

तुम्हारे पास समंदर था और मेरे पास पहाड़ दादू

तुम्हारे पास समंदर था सो मचलते रहे ताउम्र मेरे पास पहाड़ था, सो भटकता रहा मोड़ मुहानों से ताउम्र। तुम्हारे पास समंदर की लहरें थीं खेलने उलीचने को जो …

षब्द क्यों छूछे लग रहे

सारे षब्द क्यों छूछे लग रहे हैं क्यों सारी भावनाएं उधार सी लग रही हैं सेचता हूं तुम्हारे लिए कोई टटका षब्द दूं उसी षब्द से पुकारूं मगर सारे …

आंगन कहां है अम्मा

आंगन कहां है अम्मा घर भर में एक आंगन ही हुआ करता था जहां अम्मा बैठाकरती थीं अंचरा में बायन लेकर रखा करती थीं हाथ में बायन तोड़ तोड़कर …

पोटली बांध दी है पहाड़ की चोटी में

मेरा जो भी दुख था या जिसे कहते हैं सुख एक पोटली बना कर बांध दी है उस सामने वाले पहाड़ की चोटी में। हां वही पहाड़ जो रहता …

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं घोल कर प्रीत की ढली उलीच डालूं तुम्हारे खारेपन, भर दूं आकंठ मुहब्बत की तासीर तुम्हारे खालीपन में बो दूं दूब संगी की …

तेरे शहर से

उम्मीदों भरे तेरे शहर से नाउम्मीदों की पेाटली बांधे निकल पड़ा उस पार खेत यहीं रह गए रह गई तेरी उम्मीदों के स्वर बस मैं चलता हूं तेरे उम्मीदों …

बस ज़रा प्यास से

किसी दिन जिंदगी का लैपटाॅप यूं ही खुला रह गया और मैं चला गया दूर कहीं किसी भूगोल में सोचो कैसे खोल पाओगे मेरी जिंदगी का लैपटाॅप सारा का …