Author: Ajay Kumar Mallah "Karuna"

सजना सँवरना भी – अजय कुमार मल्लाह

यौवन की माया है तेरी कंचन सी काया है, तूने तासीर-ए-हुस्न में बहुतो को सताया है, सूख जाएगा एक दिन यौवन का झरना भी, तब यकीनन भूल जाएगी सजना …

सँवरना आता है – अजय कुमार मल्लाह

फ़र्क पड़ता नहीं कदमों पर मेरे समझाने का, इन्हें तो बस तेरी गली से गुज़रना आता है। है तुझे अपना ख़याल मगर मेरी परवाह नहीं, मेरी हर बात पर …

अकबर-प्रताप संवाद – 1 – अजय कुमार मल्लाह

अकबर – मृग के जैसी मौत मिले, जब सिंह से लड़े सियार, हम हैं ख़ुद राजाओं के राजा, तुम हो राजकुमार। प्रताप – अभी तो जंग शुरू हुई है, …

इज़ाफा – अजय कुमार मल्लाह

वो गुज़री तो कल थी खुश्बू अब भी है राहों में, कि ख़्वाहिश है मेरी इतनी रहूँ उसकी पनाहों में, क्या पता उसे पाकर मै थोड़ा सा सँभल जाऊँ, …

दर्द जुदाई का – अजय कुमार मल्लाह

महफ़िल महफ़िल यही शोर है, तेरी ज़िन्दगी में कोई और है। ये दीवानगी है कि आवारगी है, भटकता मुसाफ़िर नहीं ठौर है। पलकें झुकाकर रो कर, रूला कर, छोड़ …

तन्हाई अच्छी है – अजय कुमार मल्लाह

ख़्वाहिश नहीं खुदा से मिलूं ये ख़ुदाई ही अच्छी है, बरकत-ए-इश्क़ दूरियों में है तो जुदाई ही अच्छी है, ग़मजदा होकर बिखरूँ अब हिम्मत नहीं रही मुझमें, महफ़िलों का …

मोहब्बत की शायरी – अजय कुमार मल्लाह

(1) उसके लबों की ख़ामोशियाँ कुछ बता रहीं थीं, जब वो छोड़कर मुझे तन्हा कहीं जा रही थी, मैं ही पागलों की तरह ये दिल्लगी कर रहा था, मत …

कुछ ऐसा चाहता हूँ – अजय कुमार मल्लाह

मुझे मेरे हिस्से का इश्क़ मयस्सर क्यूं नहीं, खुदा तुझसे इस बात का जवाब चाहता हूँ। मालूम तो पड़े कीमत मुझे मेरे अरमानों की, टूटकर बिखरते सपनों का हिसाब …

सच्चा प्यार – अजय कुमार मल्लाह

————– (1) ————— मनचाहा प्यार मिले सबको, ऐसी किस्मत नहीं होती, बंदिशें तोड़कर अपनाए, इतनी हिम्मत नहीं होती, रौंद जाते सब अरमान और छोड़ जाते हैं तन्हा, ऐसे तोड़ते …

अंजाम-ए-वफ़ा – अजय कुमार मल्लाह

हमको तो अंजाम-ए-वफ़ा ख़ूब है मालूम। हम इश्क़ निगाहों में अब पलने नहीं देंगे।। एवज़ में मोहब्बत के लोग देते हैं कज़ा। परवाने को फ़ानूस में जलने नहीं देंगे।। …

मुझको छोड़ के – अजय कुमार मल्लाह

मैं तलाशती रही इस सवाल का जवाब, कि क्यूं तोड़ गया वो मेरा हर ख़्वाब, हर पल भगवान से मांगा जिसे हाथ जोड़ के, वो चला गया क्यूं अकेला …

मिट्टी का खिलौना हूँ – अजय कुमार मल्लाह

मिट्टी का खिलौना है जिस्म लोगों की नज़र में, अब तो लगता नहीं अपना कोई भी इस शहर में, पता पूछती फिरती हूँ कोई बता दे मौत का, फांसी …

उलझन – अजय कुमार मल्लाह

मैं तो लड़खड़ाता हूँ तु चलता चाल में होगा, नहीं मालूम है मुझको तु किस हाल में होगा। सपने जागती आँखों से देखने की आदत है, सोचता हूँ कि …

वो मुझमें रहती है – अजय कुमार मल्लाह

कल ख़्वाब में मिली मुझसे तो कह रही थी वो, मेरी कुछ हरकतों से आजकल नाराज़ रहती है। मेरा यूं भीगना बरसात में अच्छा नहीं लगता, उसकी तबियत कई …

मै गुनहगार हो गया हूँ – अजय कुमार मल्लाह

समझ के खिलौना तोड़ा दिल, अब मै बेकार हो गया हूँ, सज़ा मोहब्बत की मिल रही है, मै गुनहगार हो गया हूँ।, हर सितम शौक से सहने को, मै …

तेरी याद में – अजय कुमार मल्लाह

हक़ीक़त से अलग होती है ख़्वाबों की दुनिया, मैं हर ख़्वाब में तुझसे मुलाक़ातें करता हूँ। मेरे सब दोस्त कहते हैं मैं हो गया हूँ पागल, जब आजकल तेरी …

तुझे पाने की ख़ातिर – अजय कुमार मल्लाह

तुझे खोकर अरमां दफन करना नहीं आया, तेरी खातिर सब रिश्तों से बगावत कर ली। सितारों की भीड़ मे था चाँद को चुना मैंने, पूरे वादे कर दिए और …

तेरा नाम लिख दिया है – अजय कुमार मल्लाह

जहालत नहीं साबित की लिखकर कभी मीनारों पे, अक्सर मिटा देती हैं लहरें लिखे हुए नाम किनारों पे, मेरी नज़र में इससे महफूज जगह नहीं है “करुणा”, तेरा नाम …

वो मेरी नही है – अजय कुमार मल्लाह

मेरे दोस्त तेरा कहना है कि वो मेरी नही है, आखिर ये दिल क्यूं माने कि वो मेरी नही है। देख! देख रही है उसकी तस्वीर भी मेरी तरफ़, …

तेरा नाम मेरी तक़दीर से – अजय कुमार मल्लाह

मुझपर क्यूं इतना सितम ढाए जा रही है ज़िन्दगी, तेरा नाम मेरी तक़दीर से, मिटाए जा रही है ज़िन्दगी। मौत से पहले ना तुझको मैं भुला बैठूँ, इसलिए हर …

दीवानगी – अजय कुमार मल्लाह

अपने हाथों से अपनी ज़िन्दगी तबाह करता हूँ, मैं जानबूझ कर हर बार यही गुनाह करता हूँ। बहुत मुश्किल है तेरा ख़्याल अपने ज़हन से मिटाना, तुझे ही देखता …

जवाब – दोस्त के सवाल का – अजय कुमार मल्लाह

मेरा एक दोस्त कहता है —— कि वो कैसे तुझपे इतने सितम ढा सकती है, तुझे यूं रुलाकर खुद मुस्कुरा सकती है, कितना प्यार करता है तु उससे आज …

दुनिया होगी तेरे साथ – अजय कुमार मल्लाह

ये सिलसिले सितम के तुझपर कम नहीं होंगे, कल दुनिया होगी तेरे साथ पर हम नहीं होंगे। इन राहों पे चल रही है तो तु तन्हा ही चलेगी, ये …

दो मुक्तक – अजय कुमार मल्लाह

समझ में कुछ नहीं आता समझदारी भी ऐसी है, उसके एहसान से ज़िन्दा हूँ खुद्दारी भी ऐसी है, मेरा ये रोग मुझको तो लाइलाज लगता है, दवा करती नहीं …