Author: Man Mohan Barakoti

:::: होली ::::

  विविध रंग परिधानों वाले अपने भारत देश में। रंगों का त्योहार आ गया फिर पावन परिवेश में।। युगों-युगों से त्योहारों का रहा पुरातन नाता है। अपनेपन की दिव्य …

“बुनकर कफन वो स्वयं ही जल गया है”

नये जमाने की नई फसलें हैं, बच्चे भी अब होते दोगले हैं। पिता पुत्र को करता प्रणाम है, पुत्र पिता का करता अपमान है। सिर्फ मतलब की दुनिया है …

“स्वतंत्रता का पर्व”

(स्वर्ण जयंती वर्ष पर लिखी मेरी पुरानी रचना सादर पेश है) :::::::”स्वतंत्रता का पर्व” :::::::  —————————— स्वतंत्रता का पर्व हम मनायें। हम अपने इस देश को सजायें।। आपस के …

“तनख्वाह”

जो चीज अच्छी है लगी, वह मन को मेरे भा गई। मैं सोचता लिखता रहा, फिर नींद मुझको आ गई।। फाइलों के बोझ से, बोझिल हमारी जिन्दगी- जो मिली …

“महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जी को श्रद्धा सुमन”

सू-       सूर्य के समान तेज सुकवि सुधीर, सिन्धु सभ्यता-संस्कृति का महान रखवाला था। र्य-       यती था तपस्वी- था काव्य में यशस्वी, मनुजता के …

“सर पे वरद् हस्त, मेरी मातु धर दे”

मातु हंस वाहिनी, प्रदानी ज्ञान दायनी, सर पे वरद् हस्त, मेरी मातु धर दे। है मेरी मातु अर्चना, सिखा दे काव्य सर्जना, तू काव्य क्षेत्र में मुझे, समर्थवान कर दे।। …

“माँ जो प्रेरणा देती है मुझे……………”

ना कोई छंद लिखता हूँ। ना कोई बंद लिखता हूँ।। माँ जो प्रेरणा देती है मुझे- मैं वो अन्तर्द्वंद लिखता हूँ।। :::::::जय माँ शारदे। रचनाकार :: मनमोहन बाराकोटी “तमाचा …

“गीता कुरान बाइबिल नहीं पढ़ता कभी…..”

मैं मन्दिर में सोता हूँ, मस्जिद में सोता हूँ। जाकर चर्च गुरुद्वारे भी, सीढियों में रोता हूँ।। गीता कुरान बाइबिल नहीं पढ़ता कभी- माँ के ही आँचल में, सपने …

“हम न हिन्दू- न इसाई, न मुसलमान दोस्तों “

हम न हिन्दू- न इसाई, न मुसलमान दोस्तों। खुदा के नेक बन्दे हम, इंसान दोस्तों ।।   इंसानियत ही एक मात्र धर्म मेरा है । मानव के हेतु जी …

“हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है”

हम सबकी प्यारी जग-जननी, अपनी यह धरती माता है। जनम-जनम तक धरती माँ से, रहा हमारा नाता है।। ये शस्य-श्यामला वसुन्धरा, हमको प्राणों से प्यारी है। इसके हित जीना-मरना …

“अमर है तुलसी का कृतित्व”

गगन में जब तक है आदित्य। और विद्वानों में पांडित्य।। विधा अवधी में मानस श्रेष्ठ। अमर है तुलसी का साहित्य।। अमर है तुलसी का कृतित्व। अमर उनके कृत का …

“सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी”

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी को श्रद्धा सुमन सू- सूर्य के सामान तेज सुकवि सुधीर सिन्धु, सभ्यता-संस्कृति का महान रखवाला था। र्य- यती था तपस्वी- था काव्य में यशस्वी, मनुजता …

“नहीं मौत से डरते”

देशभक्ति का जज्बा जिसमें, नहीं मौत से डरते। बड़े भाग्यशाली ही अपनी, मातृभूमि प्रति मरते।। नहीं गोलियों से भय करते, देशभक्त दीवाने। सदा राष्ट्र प्रति वे रहते, हैं हरदम …

“आदित्य के बिना यहाँ……”

आदित्य के बिना यहाँ, होती सुबह नहीं। दुश्मन को न मिले सजा, कोई वजह नहीं।। रहने का कोई हक नहीं, उसको है देश में- गद्दार के लिए यहाँ, …..कोई …

“कवि”

कवि किसी सीमा में बंध के, रह नहीं सकता। हो रहे अन्याय को वह, ……सह नहीं सकता।। लेखनी का वो धनी, निष्पक्ष लिक्खेगा वही- तूफान के झूठे भंवर में,….. …

“हिंसा की चोट से…..”

हिंसा की चोट से, दबी-दबी जिंदगी। अहसासों के नीचे, पली-पली जिंदगी।। खामोशी के गावों में ढलती जा रही, कड़ुवाहट की छावों में छलती जा रही। अपने ही हाथों से, …

“किसी भांति कटुता न पालिये”

शान्ति के वातावरण में खुश रहें सभी लोग, शान्ति के नगर में मित्र विध्न नहीं डालिये। देखते हो मुल्क में घूमते हैं जगह-जगह, कर रहे हैं अपनों से ठगी …

घुट-घुट कर जी रहें हैं।

बेवजह कुछ लोग यहाँ, घुट-घुट कर जी रहें हैं। फिर भी ना जाने क्यों वे, घूंट विष का पी रहे हैं।। गम है हादसों का तो, पीने से क्या …

“जय सुभाष”

जिसने देश खातिर बचपन से ही शोहरत पा ली। था महान व्यक्तित्व और थी सूरत भोली-भाली।। मातृभूमि पर अपना सब कुछ कर देते न्योछावर- ऐसे वीर सपूतों के बलिदान …

भूत लातों के नहीं, मानते हैं बातों से।

नहीं यकीन रहा, अब तो रिश्ते-नातों से। घर के भेदियों से, परेशान उनकी घातों से। अब सिधाई का जमाना, नहीं रहा यारों- भूत लातों के नहीं, मानते हैं बातों …

माँ वाणी वन्दना

माँ वाणी वन्दना —————- मेरे मन के मन मन्दिर में, माँ वाणी तुम आओ। मानस तिमिर महासागर में, ज्ञानालोक जगाओ। चहुंदिशि आज विषमता फैली, समता का हो रहा क्षरण …

क्या क्या दिन देखें मैने…….

क्या क्या दिन देखें मैने, …..अब एतबार उठ गया। किस पे करें भरोसा, …….सारा कारोबार लुट गया।। अपनेपन का राग अलापने वाले, देख कर हालत मेरी- तोड़ लिया नाता …

त्रासदी

आदमी ही आदमी के, खून का पियासा है। हादसों की त्रासदी है, सब तरफ निराशा है।। नफरतों की दीवारें है, आपसी दरारें है। सच यही हकीकत है, सच का …

चौके से बाहर हुआ, सोने के संग प्याज।

सोने चाँदी की तो बात ही निराली है अब, प्याज भी दूर भाग गया है। मैने टिक्की बताशे वाले से कहा भाई साहब प्याज डाल दीजिये, तो वह कहने …

“अपना मुख मोड़ लिया है ………………”

रचनाकार : मनमोहन बाराकोटी ‘तमाचा लखनवी‘, पी० एण्ड टी० ३/२, मालवीय नगर, ऐशबाग,लखनऊ (जब कोई बूढ़े लाचार माँ-बाप आश्रयहींन हो जाते हैं और बेटों द्वारा धिक्कारने फटकारने पर जब वह घर छोड़ देते हैं, तो …