Author: अशोक कुमार शुक्ला

एक देह

एक देह देह एक बूंद ओस की नमी ……पाकर ठंडाना चाहते है सब देह एक कोयल की कूक ……सुनना चाहते हैं सब देह एक आवारा बादल ……छांह पाना चाहते …

पोल खोलक यंत्र

  ठोकर खाकर हमने जैसे ही यंत्र को उठाया, मस्तक में शूं-शूं की ध्वनि हुई कुछ घरघराया। झटके से गरदन घुमाई, पत्नी को देखा अब यंत्र से पत्नी की …

हवा ऐसी चली

हवा ऐसी चलीः सुधि का तरल लगा हिलोर भरने, कुछ अप्रत्याशित घटा जो लगा मन को- विभोर करने! बंद सीमित दायरे में तेरे अंधियारे, उंजेरे कसमसाने लगे, उद्यत- तोड़ने …

ये अपने पल

ये अपने बेहद अपने पल क्यों इतने बेगाने बीते! एड़ी से चोटी तक कैसा टंगा हुआ है एक अपरिचय दस्तक देता दरवाजों पर शंकाओं , संदेहों का भय भीड़ …

हम धरती के टूटे तारे

हम धरती के टूटे तारे, अम्बर अवनी से टूटे तो क्षितिज भला-क्यों कर स्वीकारे!     घर-परिवार, न रिश्ते नाते सब हैं , सूरत से कतराते घर में ही जब …

हम अगस्त्य के वंशज

हम अगस्त्य के वंशज ठहरे- खारे आँसू पीते, रोज सिसकियों- मर मिटते हैं और ठहाकों जीते! हम जंगल  के परिजात हैं हम कांटों मे हंसते जीवन हुआ कसौटी खुद …

शिकायत

दिन गुजरते दबे पाँवों चोर जैसे बीतती चुपचाप तारीखें सुस्त कदमों बीतते इस दौर से हम भला सीखें तो क्या सीखें?   कांच की किरचों सरीखे टूटकर बिखरती हैं …

दिन गाढ़े के आये

दिन गाढ़े के आये अगहन बीते,बड़े सुभीते माघ-पूस सर छाये। दिन गाढ़े के आये!! जूँ न रेंगती, रातों पर, दिन हिरन चौकडी जाता। पाले का, मारा सूरज मौसम के,पाँव …

गहराता है एक कुहासा

गहराता है एक कुहासा    सूखे खेतों , भूखे गाँवों , तरकोल रंगकर सूरज पर प्रखर-प्रकाशित, हैं उल्कायें, सम्भावी, इतिहास बाँचकर सिसके गीत, मर्सिया गायें, बाँध गयी, विस्तार गगन का- …

ग्राम संध्या

डूबी -डूबी साँझ ढले जब गोधूलि बेला धिर आये, भूले गीतों के कदमों पर थकी राह तब घर को आये! गुमसुम धुआँ, लकीर गया है टूटे दरबों के पाखों …

सरस सुधियाँ

सरस सुधियाँ लौटती पनिहारिनों सी तृषित ये संवेदना के तंतु मेरे आज बौराया हुआ मन तोड़ देगा कसमसाती बंदिशों के तंग घेरे ! चाह तेरी जमीं चेतन ऊतकों में …

गले पड़ी दुविधायें हैं

अफवाहों की धुंध घनी है डूबी सभी दिशायें हैं, धुआँ– धुआँ से इस मौसम की शातिर बहुत हवायें हैं!   स्याह सफेद न समझ रहा है क्या झूठा क्या …

सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा  मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा  हुआ होगा |   यहाँ तक आते -आते सूख जाती हैं कई नदियाँ …

नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो। मंगलमय यह जीवन कर दो।  विद्या विनय बुद्धि का स्वर दो । बढे आत्मबल ऐसा कर दो। नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो। …

वानर बैठा है कुर्सी पर, हुई बिल्लियाँ मौन!

वानर बैठा है कुर्सी पर, हुई बिल्लियाँ मौन! अन्धा है कानून हमारा, न्याय करेगा कौन?   लुटी लाज है मिटी शर्म है, अनाचार में लिप्त कर्म है, बन्दीघर में …

अब सूरज निकलना चाहिए

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह अब जनाज़ा ज़ोर से उनका …

पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी …

नए मील का पत्थर

इस महान विभूति ने अपने इकसठवें जन्मदिवस के अवसर पर यह कविता भी लिखी थी   नए मील का पत्थर पार हुआ। कितने पत्थर शेष न कोई जानता? अन्तिमनए मील …

बुँदेलखण्ड:कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की रचना

भारत के नभ के प्रभापूर्य शीतलाच्छाय सांस्कृतिक सूर्य अस्तमित आज रे-तमस्तूर्य दिङ्मण्डल; उर के आसन पर शिरस्त्राण शासन करते हैं मुसलमान; है ऊर्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल। शत-शत …

उमर ख़ैयाम की रुबाइयों का फारसी से हिन्दी में अनुवाद-2

बैठ, प्रिय साक़ी, मेरे पास, पिलाता जा, बढ़ती जा प्यास! सुनेगा तू ही यदि न पुकार मिलेगा कैसे पार? स्वप्न मादक प्याली में आज डुबादे लोक लाज, जग काज, …

उमर ख़ैयाम की रुबाइयों का फारसी से हिन्दी में अनुवाद -1

वह प्याला भर साक़ी सुंदर, मज्जित हो विस्मृति में अंतर, धन्य उमर वह, तेरे मुख की लाली पर जो सतत निछावर! जिस नभ में तेरा निवास पद रेणु कणों …

सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु पर लिखी कविता

  दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर मृत्यु देवताओं …

छोटा बच्चा पूछ रहा है

छोटा बच्चा पूछ रहा है कल के बारे में साज़िश रचकर भाग्य समय ने कुछ ऐसे बाँटा कृष्ण-पक्ष है, आँधी भी है पथ पर सन्नाटा कौन किसे अब राह …

हाँ अकेला हूँ मगर इतना नहीं

हाँ अकेला हूँ मगर  इतना  नहीं, तूने  शायद  गौर से  देखा नहीं. तेरा  मन बदला है कैसे मान लूँ, तूने  पत्थर  हाथ का फैंका नहीं. छू  न पायें  आदमी  …