Author: डी. के. निवातिया

झूठ बिके बेमोल — डी के निवातिया

झूठ बिके बेमोल झूठ के संग झूठ चले, सच ना सच के साथ! चोरो की टोलिया बने, साद अकेले हाथ !! साँच खड़ा बाजार में,  झूठ बिके बेमोल ! …

मिथ्या प्रेम — डी के निवातिया

मिथ्या प्रेम *** एक बकरा पाला था राम किशन ने एक बकरा पाला था रहीम खान ने मर मिटते उनकी  जवानी देखकर कहते थे दोनों, पाला है दिल-ओ-जान से …

अंदाज़-ऐ-एतराज — डी के निवातिया

अंदाज़-ऐ-एतराज *** क्यों आज फिर मौसम का मिजाज बदला है क्या सनम ने आशिक़ी का अंदाज बदला है ! दिल तो पहले ही डूबा है, अश्क-ऐ-समंदर में फिर क्यों …

आओ सीखें हाइकू —एक प्रयास — डी. के. निवातिया

आओ सीखें हाइकू   लहर चली लेखन है हाइकु कैसे लिखेंगे !! सुनो साथियो आओ सीखें हाइकू कैसी है  बला !! हाइकु विधा एक जापानी काव्य जनक बाशो !! …

हुस्न और इश्क़ — डी के निवातिया

हुस्न और इश्क़ हुस्न और इश्क़ पर किस्से आम लिख दिये कविता ग़ज़ल,नज़्म,शेर,तमाम लिख दिये कोई वीरानी कहे कोई कहे खुदा की इबादत, हमने तो ख़ुशी-गम सब तेरे नाम …

चिराग-ऐ-मुहब्बत — डी के निवातिया

चिराग-ऐ-मुहब्बत *** तेरी तूफ़ान-ऐ-नफरत भला उसे क्या बर्बाद करे    चिराग-ऐ-मुहब्बत जिसने आँधियो में जलाये हो !! ! ! ! —-:: डी के निवातिया  ::—

घोंसला वो बदनाम — डी के निवातिया

घोंसला वो बदनाम   परिदो से भी बदतर आज का इंसान हो गया ! पाए थे जहा पंख घोंसला वो बदनाम हो गया !! रूह तरसती रही, जिस्म मालमाल …

ज़ालिम — डी के निवातिया

ज़ालिम —@@@— बाँट दिया धर्म के नाम पर दुनिया को, अरे इंसानी फ़रिश्ते तेरी जात क्या है ! मै तो निर्मल जर्रा हूँ माटी-ऐ-हिन्द का तू बता ज़ालिम तेरी …

वृक्ष लगाये — डी के निवातिया

वृक्ष लगाये आओ मिलजुल कर पर्यावरण दिवस मनाये अपने अपनों के हित में  अनेको वृक्ष लगाये   शुद्ध वायु, जल,थल धरोहर स्वस्थ जीवन की   दे अमूल्य सौगात नव …

पर्यावरण दिवस — डी के निवातिया

  पर्यावरण दिवस चलो, हम भी सब की तरह झूठ मूठ की परम्परा निभा लेते है इस बार भी पांच जून को फिर से पर्यावरण दिवस मना लेते है …

ज्ञान का सागर अथाह मिलेगा — डी. के. निवातिया

ज्ञान का सागर अथाह मिलेगा  *** झिझक को अपनी तोड़ो तुम क्षमता को नया उत्साह मिलेगा ! ह्रदय चक्षुओं को खोलोगे तो, ज्ञान का सागर अथाह मिलेगा !! विद्वान …

चित्तचोर — डी के निवातिया

+++ चित्तचोर +++ —————-@@@————— चित्तचोर का चित्त चुराती   चंचल चितवन चपल चकोर चंद्र चांदनी की चकाचौंध में चैन चुरा गयी रमणी चोर !! चतुर चक्षु के चंचु-प्रहार से   …

सच्चे भक्त — डी के निवातिया

सच्चे भक्त @@@ राम, कृष्ण, और गौ माता भक्तो की मांग विशेष होने लगी है पूजा जो करते आये सदियों से अब भक्ति उनकी खोने लगी है दंगा फसाद …

नागफनी के बीच गुलाब — डी के निवातिया

नागफनी के बीच गुलाब <><><> वो जो नागफनी के बीच गुलाब खिला है। मेरी पाक मुहब्बत का नायाब सिला है।। अहसासों के मधुर पलो से सींचा है इसे तब …

प्रेम का अंकुर — डी के निवातिया

प्रेम का अंकुर *** परावर्तन के आईने में प्रेम का अंकुर उगाना है आत्मीय मिटटी में बोध का उर्वरक मिलाना है प्रेम रस से परिपूर्ण बन जायेगा ये फलित …

मेरे घर को बाँट दिया — डी के निवातिया

मेरे घर को बाँट दिया *** मेरे घर को बाँट दिया है, धर्म के कुछ ठेकेदारो ने ! मातृभूमि से छल किया है, वतन के ही गद्दारो ने !! …

दिल तो दिल है — डी के निवातिया

दिल तो दिल है परिंदो पर बंदिश है उड़ने की, ड्योढ़ी पे ताला पड़ने वाला है जाने कौन बिजली गिरने वाली है, या बादल फटने वाला है !! शहर …

गृहस्थी एक वृक्ष — डी के निवातिया

गृहस्थी एक वृक्ष जिंदगी एक खूबसूरत साज है सरगम जैसा बजा लिया करो पल ख़ुशी के हो या गम के हो मुस्कुराकर बिता लिया करो !! गृहस्थी एक वृक्ष …

अदा — डी के निवातिया

अदा +++++++++++++++ मुझसे मुहब्बत भी बेपनाह करता है फिर भी मेरी हर बात पर बिगड़ता है इसे अदा कहुँ या फितरत जनाब की जो भी हो दिल ये तो …

कैसे मुकर जाओगे — डी के निवातिया

कैसे मुकर जाओगे +++   ***   +++ यंहा के तो तुम बादशाह हो बड़े शान से गुजर जाओगे । ये तो बताओ खुदा कि अदालत में कैसे मुकर जाओगे चार …

प्रेम अनुभूति — डी के निवातिया

दिव्य प्रेम अनुभूति *** दिव्य प्रेम अनुभूति है बौद्धिक अभिव्यक्ति की मन मस्तिष्क के मिलन पर उपजी शक्ति की आत्मा से साक्षात्कार ही आनंद का खजाना है पाया उसी …

तेरी नजरो में — डी के निवातिया

तेरी नजरो में *** मुझे सुनते तो सभी है समझो अगर तुम तो मानू चाहत तो सभी को है पहचानो अगर तुम तो जानू क्या फर्क पड़ता है अच्छा …

तारणहार — डी. के. निवातिया

तारणहार मत्स्य, कूर्म, वराह और नृसिंह सत्य युग के थे अवतार त्रेता युग में भगवान बन राम ने किया था रावण संहार महाभारत के द्वारा द्वापर में कृष्ण ने …

मातृ दिवस — माँ पर कविता — डी. के निवातिया

माफ़ कर देना माँ तुझे मातृ दिवस पर याद नहीं किया मैंने शायद गुम गया कही मातृ दिवस तेरे निश्छल प्रेम की ओट में हर क्षण जो छायी रहती …

अंकुश — डी के निवातिया

मदमस्त हाथियों का डेरा है महावत के अंकुश ने घेरा है बेड़िया बंदिशों कि है पैरो में मस्तक शक्ति का सेहरा है !! ! ! ! डी के निवातिया