Author: डी. के. निवातिया

ज़लवा दिखाओ तो जाने – डी के निवातिया

ज़लवा दिखाओ तो जाने *** आज भी पहले सा मुस्कराओ तो जाने फिर से वही ज़लवा दिखाओ तो जाने !! मुहब्बत को तरस गयी है प्यासी निगाहें फिर उसी …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ये कौन सा सभ्य समाज है (2)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – दो) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ख्यालों के दरमियाँ – डी के निवातिया

  ख्यालों के दरमियाँ *** टूटे-फूटे शब्दों के खंगर जोड़-जोड़ कर ज़ज़्बातो के पत्थरों को तोड़-तोड़ कर बनाया था एक मकाँ ख्यालों के दरमियाँ गुम गए उसमे सपनो की …

ये कौन सा सभ्य समाज है (1)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – एक ) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: …

मज़दूर दिवस – डी के निवातिया

मज़दूर दिवस मज़दूर दिवस पहचान बना है श्रम बलिदान का कर्म करना ही पहला धर्म हो हर एक इंसान का न जाने क्यों हीन दृष्टि से देखा जाता है …

कितना गम है – डी के निवातिया

कितना गम है *** दिल में दर्द उठता है,जुबाँ खामोश, आँखे नम है मत पूछो यारो हमसे, जिंदगी में कितना गम है किसी का पसीना भी बहे, तो खबर …

इंसानियत की सीमा – डी के निवातिया

इंसानियत की सीमा — सोया हुआ है सिंह, सियार दहाड़ मार रहा है छल-कपट की लड़ाई में शूरवीर हार रहा है जाने किस करवट बैठेगा हैवानियत का ऊँट इंसानियत …

बुलबुल-ऐ-चमन – डी के निवातिया

बुलबुल-ऐ-चमन * कफ़स-ऐ-क़ज़ा में कैद बुलबुल-ऐ-चमन अपना है बनाएंगे जन्नत-ऐ-शहर इसे लगे बस ये सपना है फ़िक्र किसे मशरूफ सब अपनी बिसात बिछाने में नियत में ,राम-राम जपना पराया …

ज़रा खुलने तो दो — डी के निवातिया

ज़रा खुलने तो दो *** शेर सारे पढ़े जायेंगे तुम्हारे मतलब के ज़रा खुलने तो दो बाते तमाम होंगी वफ़ा संग बेवफाई की ज़रा घुलने तो दो !! हर …

बचाना भी है — डी के निवातिया

आँगन — फूलों और कलियों से आँगन सजाना भी है, कीचड और काँटों से दामन बचाना भी है, महकेगा चमन-ऐ- गुलिस्तां अपना तभी, हर मौसम की गर्दिश से इसे …

प्रत्याशा – साझा काव्यसंग्रह

आप सभी आदरणीय साथियो को यह बताते हुए अति प्रसन्नता हो रही है की हाल ही में प्रकशित हमारी पुस्तक शीर्षक      साझा काव्य संग्रह “बुक बज़ुका , …

यथासंभव — डी के निवातिया

यथासंभव — रक्षक,दक्षक,शिक्षक,भिक्षक सब दाम में बिकता है खरीददार अगर पक्का है तो सब कुछ मिलता है कौन कहता है सच कभी झूठा नहीं हो सकता कलयुग में तो …

अमर रहेगा नाम तुम्हारा — डी के निवातिया

अमर रहेगा नाम तुम्हारा *** तुम योग्य लफ्ज़ नहीं पास मेरे, कैसे करुँ गुणगान तुम्हारा राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह, कितना है अहसान तुम्हारा देश प्रेम के सूचक थे तुम …

धैर्य की परीक्षा – डी के निवातिया

    धैर्य की परीक्षा *** अब न खाली हो किसी माँ की गोद, कोई लाल अब न फ़ना हो कब तक देनी होगी धैर्य की परीक्षा, अब कोई …

बेरुखी -डी के निवातिया

बेरुखी *** करके बेवफाई, खुद को, नज़रें मिलाने के काबिल समझते हो बात बात पर देकर दुहाई मुहब्बत कि, हम ही से उलझते हो कहाँ से सीखा हुनर, इश्क …

मंजर – डी के निवातिया

मंजर *** हर मंजर से गुजर रहे है कुछ लोग, सियासत में अपना रूतबा जमाने को ! न जाने कितने गुलाब मसल डाले, फकत अपने नाम का गुल खिलाने …

डी के निवातिया परिवार की ओर से आप सब को होली की हार्दिक शुभकामनाएं

आया है पावन त्यौहार फिर से होली का गले लगाकर करो तिलक चंदन-रोली का राग द्वेष मिटाकर प्रेम का अलख जगा लो हर्षित मन सजा रहे अपनों संग रंगोली …

सगा – डी के निवातिया

सगा *** वो न मेरा, न तेरा, न इसका, न उसका सगा था सैलाब हैवानियत का उसके जहन में जगा था ! परवाह कब थी उसने दुनिया में इंसानियत …

तेरे नाम – डी के निवातिया

तेरे नाम — सोचता हूँ एक ग़ज़ल तेरे नाम लिख दूँ राज़-ऐ-दिल मुहब्बत के तमाम लिख दूँ उठे गर नजरे तो रोशन ऐ आफताब कहें ज़रा झुके जो पलकें, …

नूर हूँ मै – डी के निवातिया

नूर हूँ मै @ तेरे मुखमंडल की आभा से प्रज्वलित होता दीप हूँ मैं तेरे ही आशीर्वचनो से फलीभूत होता आशीष हूँ मै तुम कारक, कारण तुम ही तुम …

स्वेटर माँ के हाथ का – डी के निवातिया

स्वेटर माँ के हाथ का — सर्दी से बचने के लिए, आज लबादों से लदा हूँ, महंगे सूट पहनकर ! मगर वो गर्माहट नहीं मिलती, जो माँ के हाथ …