Author: दीपेश जोशी

सहरा को समंदर बनाने चले हो

खुद अपनी तामीर मिटाने चले हो सहरा को समंदर बनाने चले हो।   बातें करता है ज़माना अब तो कि तुम अपनी तकदीर मिटाने चले हो   सहरा को …

ज़मीनी हकीकत

दिन रोज़ ढलता है, शाम गुजरती हैं, मुसीबतें पार कर ही शख्सियत उभरती हैं। रुह तक कॅाप जाती है इबादत करने में कई कोशिशों बाद कोई तामीर सवरती हैं। …