Author: अशोक धर

चित्र में माँ

माँ के उरोज़ों के बीच बहती-लहराती नदी में डूबता-उतराता रहता था बचपन में आज मैं साठ की दहलीज पर हूँ कई तीखी-गहरी, मदमाती-उफनती नदियाँ देख चुका हूँ कई नद, …

एक खिड़की खुली है अभी

एक ही राह पर चलते चले जाने और हर आंधी से ख़ुद्को बचाते रहनेकी आदत ने आख़िर मुझे पटखी दिया उस अजीबो-गरीब हवेली में बंद होते गएजिसके बाहरी-भीतरी दरवाज़े …

स्मृति : एक हादसा

आगे देखते हुए पीछे देखना और पीछे देखते हुए आज को फलांग आगे की अटकलें एक हिक़मत पीछे त्रास, सामने लोभ और आगे ‘कुछ भी नहीं’ का अंधेरा स्मृति …

ये क़ाफ़िले यादों के कहीं खो गये होते

ये क़ाफ़िले यादों के कहीं खो गये होते इक पल अगर भूल से हम सो गये होते ऐ शहर तिरा नामो-निशाँ भी नहीं होता जो हादसे होने थे अगर …

महफिल में बहुत लोग थे मै तन्हा गया था

महफिल में बहुत लोग थे मै तन्हा गया था हाँ तुझ को वहाँ देख कर कुछ डर सा लगा था ये हादसा किस वक्त कहाँ कैसे हुआ था प्यासों …

ये क्या जगह है दोस्तों

ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है हद्द-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है ये किस मुकाम पर हयात मुझ को लेके आ गई न बस …

सीने में जलन

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे पत्थर की तरह …

सखि वे मुझसे कह कर जाते

सखि, वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते ? मुझको बहुत उन्होंने माना फिर भी क्या पूरा पहचाना ? मैंने मुख्य उसी को जाना जो …

शिशिर न फिर गिरि वन में

शिशिर न फिर गिरि वन में जितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इस निज नंदन में कितना कंपन तुझे चाहिए ले मेरे इस तन में सखी कह रही पांडुरता का …

मुझे फूल मत मारो

मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो। होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो, मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो। नही भोगनी यह …

मातृभूमि

नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है। सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥ नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं। बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥ करते अभिषेक पयोद हैं, …

भारत माता का मंदिर यह

भारत माता का मंदिर यह समता का संवाद जहाँ, सबका शिव कल्याण यहाँ है पावें सभी प्रसाद यहाँ । जाति-धर्म या संप्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहाँ, सबका स्वागत, सबका …

प्रतिशोध

किसी जन ने किसी से क्लेश पाया नबी के पास वह अभियोग लाया। मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं। नही निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं। उन्होंने शांत कर उसको …

नहुष का पतन

मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की अरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की दिखता …