Author: Bindeshwar prasad sharma

पैसा – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हम दरिद्र पर रहम कैसा है मन में सबका वहम पैसा है। ना साथ जायेगा न रहेगा आदमी का करम पैसा है। धन – दौलत है केवल नाम का …

लाचार – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

इतना है लाचार बेचारा क्या करेगा कोई करे विचार बेचारा क्या करेगा। कोशिश करके हारा है जालिम जमाने से फिर भी था तैयार बेचारा क्या करेगा। मंजिल पास पड़ी …

धैर्य – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

धैर्य मत खोना,पीठ पे रसूल है तेरा लड़ते रहो सत्य पे ,ये उसूल है तेरा। कत्लेआम हो रहा, तो उसे रोको तुम असत्य हेतु जान देना, फिजूल है तेरा। …

वर्ण पिरामिड – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

माँ बेटा ममत्व सत्य प्रेम खून का रिश्ता दिल का टुकड़ा तड़प मिलन की दो राही अंजान संकट में साथ रहते रिश्तों से बढ़के दोनों फर्ज निभाते ये कस्ती …

वर्ण पिरामिड – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हे मन रुक जा सोच जरा विचार कर गलत ना कर तुफान आ जायेगा हे राम मुझे भी सौगात दे आशीर्वाद दे भक्त हूँ तेरा मैं मुझे अब तार …

निश्छल प्रेम – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जहाँ निश्छल प्रेम सदा रहता जहाँ उज्ज्वल दीप सदा जलता। उस परिपाटी का क्या कहना सदियों की रीत जहाँ फलती।। यहाँ वर्णित है संस्कारों का यह भुगोल है उपकारों …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सत्य सनातन मधु वचन, जो सब रखते साथ खुशियाँ वो पाते सदा, रखते जिस पर हाथ। संतन की सेवा करो, उन पर रख कर ध्यान गली – गली ठग …

दोहा ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दोहा ग़ज़ल जगमग – जगमग दीप का , आया यह त्योहार खुशियाँ सब को भा गईं, करते सब मिल प्यार। राम चन्द्र भगवान का, हुआ आगमन आज गुजर बरस …

ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपने मखमली ख्वाब , ये ख्याल छोड़ दो उनके जिगर में उतरने का मलाल छोड़ दो। कोशिशें तेरी, सारे नापाक हो जायेंगे अपनी हरकतें ये बेरूखी चाल छोड़ दो …

ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

मुझे बेच दो दूसरे के हाथ , ये मंजूर नहीं मैं झुका हुआ जरूर हूँ, इतना मजबूर नहीं। मुझे मेरे हाल पर यूँ, तड़पने के लिए छोड़ दो मुझे …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दोहे- दो मासूम विलख गये मासूम दो, देखा जब ये हाल उनकी मम्मी मर गयी,छाया देख मलाल। सुरा के संग बाप है, बेच खेत खलिहान ये बेचारी दो बहन, …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शिक्षा अब व्यवसाय का, पकड़ा ऐसा रूप जैसे नीर विहीन अब, सूख रहे सब कूप। करती है गुमराह अब, नैतिकता की बात कूटनीति की चाल भी , कर देती …

अंत काल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

कोई ना होगा संगी साथी जब अंत काल आ जायेगा। कोई साथ ना देगा तुमको तुम देख देख पछतायेगा।। मन में जो गुमान था तेरा सब चकनाचूर हो जायेगा। …

दकदीर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तुम संवारो अपनी तकदीर, रास्ता हम देंगे बदल लेना अपनी तस्वीर, रास्ता हम देंगे। भटक गये हो बहुत तुम, अपनों की ही चाह में अपने कर्मो पर हो गंभीर …

तितली – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तितली तुम बड़ी सयानी हो पास आती पर उड़ जाती हो। मन मोहक तेरा रंग निराला हमें छोड़ फूलों पर जाती हो।। मादक मधु रस तुम लेती हो बदले …

शजर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शजर एक विशाल खड़ा है हर पत्ता उसका बेटा है अटल अडिग हिमालय सा वह खड़ा रहकर भी लेटा है। जड़ सजल धरती के नीचे खुला आकाश है ऊपर …

ईमान – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दौलत मिली ईमान बदल गया पाकर जिसे इंसान बदल गया। नसीहत देने वालों की कमी नहीं बस अंदाज़-ए -निदान बदल गया। भरोसा कौन किस पर करेगा अब सच पैमाने …

जनसंख्या – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सारे समस्याओं का जड़ है जन संख्या का बढ़ जाना समस्याओं हल करते करते आपस में ही लड़ जाना। बेरोजगारी अराजकता मंहगाई सब के सब भारी है गरीब किसान …

याचक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

याचक हूँ मांगता द्वार द्वार करता हूँ विनती बार बार। कोई रहम करे बस सोचता मैं अपने आप पर कोशता। मैं इसी वतन का साथी हूँ जलता मद्धिम सा …

भिक्षुक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

भिक्षुक हूँ मारा मारा फिरता हूँ। भूखा बिलकुल शांत कभी उठता कभी गिरता हूँ भिक्षुक हूँ मारा मारा फिरता हूँ। घर बार नहीं मेरा यहाँ वहाँ भटकता हूँ भिक्षुक …

माटी मांगे प्रीत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

माटी मांगे प्रीत यह, धरती रहे पुकार बातें फिजूल छोड़के, इसपे करें विचार। खून की होली अब तुम मत खेलो अपनी गलती दूसरे पर न ठेलो। आपस में मिलके …

कुण्डलियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चूनर धानी ओढ़ के, बैठी आँगन आय अम्मा चाची देखके, दुल्हिन गयी लजाय। दुल्हिन गयी लजाय, देखके अम्मा तरसे घर आ गई बहार, खुशी से कलियाँ बरसे। घर का …

अपना शहर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपना ही शहर क्यों बेजान सा लगता है जर्रा जर्रा मुझे अब अंजान सा लगता है। भूले अपनी काबिलियत तुम्हें देखकर बदले हुए नजारे परवान सा लगता है। देखकर …

मुस्कुराहटें – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जिनकी मुस्कुराहटे अब हो गयी है खत्म उसे आप फिर से लौटाने की बात करो। जो बिलकुल लाचार बेवस है जमाने से उनको अब फिर से हंसाने की बात …