Author: Bindeshwar prasad sharma

लाचार अब तंग तिरंगा है – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

अमीरों के लिये क्या? गरीबों के लिए महंगा है दुनिया में हर जगह हर तरफ यही तो पंगा है। पांच सदस्य दस जगह दस शहरों में दस महल भूखे …

रात आती है – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

रात आती है चली जाती है न जाने कौन सी रात आखरी होगी। ऐसे मिलते हैं बिछड़ जाते हैं न जाने कौन सी मुलाकात आखिरी होगी। गम होता है …

मुखिया जी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मुखिया जी तनी कर दीं भलाई अपने अकेले ना खाईं मलाई। नाम होय जाई जब करवा तूं सेवा गरीब ई जनता के मिल जाइ मेवा भटकल बा ओकरा के …

ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

फिसलते फिसलते फिसल गयी जिंदगी मौत से ही पहले उलझ गयी जिंदगी। हम तो यादों में ही बहकर रुक गये मेरे अरमानो को निगल गयी जिंदगी। था सहारा जिसका …

ग़ज़ल- बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

रूह में उतरकर क्यों अलविदा कह दिये सुकून मिला, जब अपना पता कह दिये। बेचैन होने लगे दिल धड़कने लगा खता क्या थी,लोग हमे बुरा कह दिये। पता ठिकाना …

नया साल मुबारक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

नदियाँ गाती झरने गाते सूरज चंदा तारा नया साल मुबारक भैया दो हजार अठारा । दो बिदाई सतरा की खत्म करो ये नारा नया साल मुबारक…………… । सबको वो …

नव वर्ष – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

देखो रे नटखट सूरज आया वक्त बदल कर फिर मुस्काया नव वर्ष ने भी वेश बदलकर खुशियों का सौगात ले आया। गलत किये जो उसको छोड़ो जो अच्छा था …

मेरी बात करना – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

जब दिल दुखे तो मेरी बात करना मन जब न लगे तो मुलाकात करना। बने हैं हम सिर्फ ख्वाहिशों के लिये देकर आवाज़ दिल से याद करना। तन्हाई इधर …

हाइकु – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

हाड़ कांपता ठंढ की नजाकत पछुआ हवा। धूप की आश बदली में सूरज मन उदास। शीत लहर बच्चे बूढ़े जवान सब बेहाल। शर्द सी हवा धूंध वाली बदली सन्न …

दोहे – 18 – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

रे मन सुमिरौं राम को हृदय करि हरि धाम भगवन चरण पखारि कै चहुंपत हैं सुरधाम। काया है किस काम की मिलैं न उनके दाम कलियुग में श्री राम …

चिंतन – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

आंखों में लज्जा होठों पर खुशी की चाहत वाणी में मधुर आवाज़ को संजोए हृदय में प्यार की विशालता लिए हुए मन में सद्भाव सत्य विचार की पवित्र भावना …

भव सागर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

अहो भाग्य जो नर तन पावा तरस रहे गण मन जो भावा। योणी श्रेष्ठ मनु रचि डाला तापर कृपा करें प्रतिपाला। माया रूपि लोभ संग छोड़ा निरख परख गुण …

मानसिकता – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मर्द का खाना औरत का नहाना कोई देखता कोई नहीं अब सब उल्टा पुल्टा रात में जागते हैं दिन चढ़ते सोते हैं किसी का कोई नहीं सुनता सब जगह …

स्वेत वर्ण – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

प्रिय भाषिणी सु मधुर रागिनी तेरी अंग अंग अमृत सु मधुर मधु मालिनी तूं दानव देव नर कामिनी रस हासिनी आमोद नृत्यांगणी।-(विहारिणी) विवेक हारिणी सु शुभ आसनी मंद मद …

माया नगरी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

क्या करोगे तुम क्या करोगे रो रो कर एक दिन तो ऐसे जाना सब छोड़ कर। प्रेम से रहना प्रीत से जीना ही सीखें गुस्से में आकर भैया अब …

बेकसूर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

आंखों देखी बात सच थी या झूठ पता नहीं नजरबंद था या वक्त का तकाज़ा धोखा इसी का नाम है सच कहूँ तो भरोसा नहीं विश्वास में घात जरूरी …

कर्तव्य – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

देने वाला एक है दाता मांगे लाख करोड़ आस लगाये बैठे बैठे अपना सिर ना फोड़। इतनी सुंदर काया देकर बुद्धि ज्ञान भर भेजा जैसी कर्तब्य अब फल वैसा …

हाइकु – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

बिन लगाम छल कपट धोखा धारावाहिक टूटते रिश्ते करती गुमराह रूठा दिल नहीं करते मतलब की बातें टाल मटोल मुंह में राम हत्या अपहरण दहाड़े दिन क्यों करते हैं …

मीठा फल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

गलत फहमिओं में जीना कोई जीना नहीं मस्त होकर जीओ,तेरा हक तुझे मिलेगा बस तुम सिर्फ आम बोओ मैं तुम्हें मीठा फल दूंगा।

वक्त – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

वक्त का बहाना अच्छा है अंधे को आईना दिखाना अच्छा है मजबूरियों की बात कुछ और है साहब अच्छों – अच्छों को मुर्ख बनाना अच्छा है।

दिल की आग-बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

आग दिल में हम लगाये हुए हैं चोट पत्थर का ही खाये हुए हैं। हमें अपनो ने मारा है भरदम अपने किस्मत से हारे हुए हैं। जबसे खाये मुहब्बत …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मुख से वाणी प्रीत की मन से बोले आप श्रवण करे चित लाय जो तापर छोडे छाप। करतब का है जानिये मन का मंदिर झांक जल गया तो है …

कवि और कविता – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

कौन कहता है मैं कवि हूँ कभी था आज आदमी हूँ। जी तोड़ मेहनत की थी बहुत कुछ सीखा था बहुत कुछ परखी भी थी कवि बनने के लिए …

सब्र – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

न सब्र है न धेर्य है यहां सब के सब खुदगर्ज है। अस्त है बड़ा व्यस्त है यहां सब रिश्ते ही त्रस्त है। न आदर है न सत्यकार है …