Author: Bindeshwar prasad sharma

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शिक्षा अब व्यवसाय का, पकड़ा ऐसा रूप जैसे नीर विहीन अब, सूख रहे सब कूप। करती है गुमराह अब, नैतिकता की बात कूटनीति की चाल भी , कर देती …

अंत काल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

कोई ना होगा संगी साथी जब अंत काल आ जायेगा। कोई साथ ना देगा तुमको तुम देख देख पछतायेगा।। मन में जो गुमान था तेरा सब चकनाचूर हो जायेगा। …

दकदीर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तुम संवारो अपनी तकदीर, रास्ता हम देंगे बदल लेना अपनी तस्वीर, रास्ता हम देंगे। भटक गये हो बहुत तुम, अपनों की ही चाह में अपने कर्मो पर हो गंभीर …

तितली – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तितली तुम बड़ी सयानी हो पास आती पर उड़ जाती हो। मन मोहक तेरा रंग निराला हमें छोड़ फूलों पर जाती हो।। मादक मधु रस तुम लेती हो बदले …

शजर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

शजर एक विशाल खड़ा है हर पत्ता उसका बेटा है अटल अडिग हिमालय सा वह खड़ा रहकर भी लेटा है। जड़ सजल धरती के नीचे खुला आकाश है ऊपर …

ईमान – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दौलत मिली ईमान बदल गया पाकर जिसे इंसान बदल गया। नसीहत देने वालों की कमी नहीं बस अंदाज़-ए -निदान बदल गया। भरोसा कौन किस पर करेगा अब सच पैमाने …

जनसंख्या – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सारे समस्याओं का जड़ है जन संख्या का बढ़ जाना समस्याओं हल करते करते आपस में ही लड़ जाना। बेरोजगारी अराजकता मंहगाई सब के सब भारी है गरीब किसान …

याचक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

याचक हूँ मांगता द्वार द्वार करता हूँ विनती बार बार। कोई रहम करे बस सोचता मैं अपने आप पर कोशता। मैं इसी वतन का साथी हूँ जलता मद्धिम सा …

भिक्षुक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

भिक्षुक हूँ मारा मारा फिरता हूँ। भूखा बिलकुल शांत कभी उठता कभी गिरता हूँ भिक्षुक हूँ मारा मारा फिरता हूँ। घर बार नहीं मेरा यहाँ वहाँ भटकता हूँ भिक्षुक …

माटी मांगे प्रीत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

माटी मांगे प्रीत यह, धरती रहे पुकार बातें फिजूल छोड़के, इसपे करें विचार। खून की होली अब तुम मत खेलो अपनी गलती दूसरे पर न ठेलो। आपस में मिलके …

कुण्डलियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चूनर धानी ओढ़ के, बैठी आँगन आय अम्मा चाची देखके, दुल्हिन गयी लजाय। दुल्हिन गयी लजाय, देखके अम्मा तरसे घर आ गई बहार, खुशी से कलियाँ बरसे। घर का …

अपना शहर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपना ही शहर क्यों बेजान सा लगता है जर्रा जर्रा मुझे अब अंजान सा लगता है। भूले अपनी काबिलियत तुम्हें देखकर बदले हुए नजारे परवान सा लगता है। देखकर …

मुस्कुराहटें – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जिनकी मुस्कुराहटे अब हो गयी है खत्म उसे आप फिर से लौटाने की बात करो। जो बिलकुल लाचार बेवस है जमाने से उनको अब फिर से हंसाने की बात …

शरारत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तेरी कुर्बत में हम भी ख्वाब सजाये बैठे हैं वस्ल ए निगाह में छुपकर दाव लगाये बैठै हैं। भरोसा होता नहीं क्यूँ मुझे फिर से दिल लगाना एक असरे …

सोन चिरैया – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

खेत का सोंधी मिट्टी महके इस पीपल की छाँव में। सोन चिरैयाँ फिर फिर आवे मोती चमके पाँव में।। सरसो पीले फूल से सज गये गोरी झूमे साँझ में। …

कौतूहल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

कितनी बड़ी है दोस्ती, कितना बड़ा है प्यार जीवन पर ही चल रहा, इतना बड़ा संसार। कौतूहल में पड़ गये, निकलो बाहर आज सत्य अहिंसा प्रेम का, मन में …

अजब होय गया – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

  अजब होय गया रे भैया ये गजब होय गया बेटवा निकला 420 देखो गजब होय गया। बाप ना जाने छीना – छपटी, मैया ना जाने भेद बाप बेचारा  …

तलाश – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

खुद की तलाश में भटकता रहा दुश्मनी के कारण अटकता रहा। कभी मैं सूली पर लटक गया कभी खौफ में सिमटता रहा। खुदगर्ज क्या रास्ता दिखायेंगे कभी गिरा कभी …

दीपावली – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अभी अभी तो दीप जला है अभी अभी दीवाली है। झूमो भैया बहना नाचो चारो तरफ खुशहाली है।। खूब पटाखे ये फुलझड़ियाँ सब के दिल बहलायेंगे । खूब मिठाई …

महबूब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हकीकत है या, कोई ख्वाब दिवाने का अदा उनकी है यह, या अंदाज़ लुभाने का। इतनी शोखी, मुहब्बत की महबूब हो तुम नजरें हों इनायत , मेहरबाँ शरमाने का। …

प्रीत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

जीत कर हार गये मेरी मजबूरी थी प्यार पाने के लिये ये भी जरूरी थी। जिद के खातिर मैंने उनकी लाज रखी क्योंकि मेरे नजरों में प्रीत अधूरी थी।

दुल्हिन – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

बारात आई दुल्हिन भागी हंगामा हो गया बाप रे बा। मच गई अफरा तफरी देखो ड्रामा हो गया बाप रे बा। कोहराम मच गया ऐसे घर में भीड़ जमा …

फिरंगी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

कहाँ कहाँ तुम बच पाओगे चारो तरफ फिरंगी है। समझ पाओगे उसको कैसे जो मन के सतरंगी है। गिरगिट सा वो रंग बदलता आदत उसकी गंदी है। लालच है …