Author: Bhawana Kumari

साहित्य परिवार का साथ (चार,पांच)Bhawana kumari

4)माना कि संग में आपके दौड़ नही सकती आपके शब्दों को अपने शब्दों से जोड़ कर नही सकती। पूरे होगे मेरे भी सपने जो कल ही हमने संजोए थे। …

साहित्य परिवार का साथ (तीन )-Bhawana Kumari

न जाने वह सुबह कब आएगी जब मैं अपने सपनों को दलदल से बाहर निकाल आशाओ की रथ दौड़ाऊंगी । अगर mill जाए “‘किस्कु’, ‘ अनु ‘,’राजीव,’विजय’, मनुराज’,’अरुण तिवारी’जी …

नारी

1) नारी के स्वभाव को  समझने वाला कोई नहीं, तन का पुजारी दुनियाँ सारी,मन का पुजारी कोई नहीं। 2)  नारी को तुम अवला मत कहना यह भुल बहुत ही …

सपनों का टुटना

मैंने अपने सपनों को टुटते देखा है मैंने अपने अरमानों को कुचलते देखा है। ख्वाहिश नहीं थी मुझे किसी राजधराने की बहुँ बनु। ख्वाहिश नहीं थी मुझे किसी जमींदार …