Author: भावना तिवारी

गुलमोहर

यूँ किनारे खड़े रहकर देखते हो क्या बताओ गुलमहर। लपक पड़ते हो किसी गठरी उठाये यात्री पर। देह पर झन्ना लपेटे किसी पगली धात्री पर। सहन का संदेश देते …

कविता -स्वाभिमान

क्षमा क्यूँ माँगूँ हाथ जोडूँ मन को तोडूँ केवल तुम्हारा, रखूँ मान इसलिए कि मैं स्त्री हूँ ! मैं विवश रहूँ न लूँ साँस न खोलूँ पर न देखूँ …

जीवन-साथी

मेरे जीवन साथी मैं तुम्हें स्वेक्षा से नमन करती हूँ !! सकुची-सकुची आई थी घर आँगन में तुम्हारे लोगों ने बताया था यही है ससुराल उधड़ेगी की खाल उठेंगे …