Author: आलोक पान्डेय

आहत ग्रामवासिनी मर्माहत कल ! – आलोक पाण्डेय

उम्र बीत गयी ज्यों दासता के तले, मरकर यों ही ना दु:ख भूलाया कभी , मरना , है जीवन की एक दृढ कड़ी देखा एक मरा है , अभी-अभी …

धार में मिला किनारा

डूबा हूँ आँसुओं में, ले दर्द का सहारा ये कम क्या मुझ पर अहसान यह तुम्हारा वे और लोग होंगे व्यथित, लहरों के संग भटके मुझको तो धार में …

स्वर्णिम भारत की बेटियाँ

संसार की सार अाधार हो तुम जीवन की हर सत्कार हो तुम मंगल शांति सुविचार हो तुम हर वीर मन की पुकार हो तुम प्रतिपल मन कहता हे बेटी …

आ जाना मेरे पास प्रिये !

—- आ जाना मेरे पास प्रिये ! —————————– ???????????????????????? अभि कल तक तुमने यूं ही प्यार किया , अहो विलक्षणी ! तुने कैसा श्रृंगार किया, रूपसी! तु मुस्कुराकर यों …

धरा का तु श्रृंगार किया है रे !

तू धीर, वीर ,गंभीर सदा जीवन को उच्च जिया है रे, तु दुःखियों को सींचित् कर श्रुति स्नेह से कैसा ,ह्रदय रक्षण किया है रे ! तु भाग्य विधाता …

मंगल नववर्ष मनाएँगे

गाँव-गाँव में शहर-शहर में, कैसी छायी उजियाली है; खेतों में अब नव अंकुर , नव बूंद से छायेगी हरियाली है | बहुत कुहासा बीत चुका अंतर्मन का ठिठोर मिटा, …

वह – ~~’ आलोक पाण्डेय`

वह हर दिन आता सोचता बडबडाता,घबडाता कभी मस्त होकर प्रफुल्लता, कोमलता से सुमधुर गाता… न भूख से ही आकुल न ही दुःख से व्याकुल महान वैचारक धैर्य का परिचायक …

वीरों नववर्ष मना लें हम

है तिमिर धरा पर मिट चुकी आज भास्वर दिख रहे दिनमान , शस्य – श्यामला पुण्य धरा कर रही ; वीरों तेरा जयगान ! शुभ मुहुर्त्त में,महादेव को, सिंधु …

आ जा चित्तवन के चकोर

स्वर्णिम यौवन का सागर-अपार टकरा रहा तन से बारंबार विपुल स्नेह से सींचित् ज्वार रसमय अह्लादित करता पुकार अन्तःस्थल में उठता हिलोर आ जा ! चित्तवन के चकोर ! …

मंगलमय पुकार करूँ

यदि जीवित रहूँ माते, तेरा ही श्रृंगार करूँ अर्पण करूँ सर्वस्व तूझे, हर त्याग से सत्कार करूँ; हो त्याग ऐसा वीरों सी, कलुषित विविध विकार हरूँ पुष्पित – पल्लवित …

आर्यावर्त की गौरव गाथा

भ्रमण करते ब्रह्मांड में असंख्य पिण्ड दक्षिणावर्त सुदुर दिखते कहीं दृग में अन्य कोई वामावर्त हर विधा की नवीन कथा में निश्चय आधार होता आवर्त सभी कर्मों की साक्षी …

भारत की बेटियाँ

जिसने भारत की दिव्यता की प्रखर शक्ति बढायी परतंत्रता की संकट में अटूट भक्ति दिखायी जिनके अप्रतिम शौर्य धैर्य से मिली स्वाधीनता की रोटियाँ आज स्वाधीन हम कहाँ ? …

नववर्ष धरा पर कब ? ~ आलोक पान्डेय

ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं है अपना ये त्योहार नहीं है अपनी ये तो रीत नहीं है अपनी ये व्यवहार नहीं धरा ठिठुरती है शीत से आकाश में कोहरा …

रसिक मित्र ~ `आलोक पान्डेय`

कुछ हैं मेरे रसिक मीत कुछ जिन्हें भाता संगीत कुछ अन्याय से होते विभीत स्वभाव से कुछ हैं विनीत| देख ललनाओं का सौम्य श्रृंगार मिलता!सुकून इन्हें शांति और प्यार …

भारत वैभव

जहॉ सभ्यता की शुरूआत हुई हर ओर धरा पर हरियाली, दया, दान करूणा के सतत् सत्कर्म से फैली रहती है उजियाली हर क्षेत्र होता पावन पुरातन,बच्चों से बूढो तक …

मर्यादा की डोर

हरेक की अपनी सीमाएँ है, मर्यादा की डोर से लिपटे, कुछ अपनी भावनाए दबाये रखते है, कुछ मर्यादा की सीमओं में भी, बेख़ौफ़ गाते है, कुछ इससे आगे बढ़कर, …

वे लोग – आलोक पान्डेय

~~~वे लोग~~~ उदासीन जीवन को ले क्या- क्या करते होंगे वे लोग न जाने किन – किन स्वप्नों को छोड़ कितने बिलखते होंगो वे लोग| कितने संघर्ष गाथाओं में, …

माँ तूझे भूला ना पाया – आलोक पान्डेय

माँ! एक दिवस मैं रूठा था बडा ही स्वाभिमानी बन , उऋण हो जाने को तुमसे भी विरक्त हो जाने को, त्यागी बन जाने को ! घर त्याग चला …

वीर तूझे आना होगा

~~~~~वीर तूझे आना होगा~~~~~ स्वदेश में वीरों तूम्हे तत्क्षण पुनः आना होगा कारण ना पूछना यदि हो, ना ही कोई बहाना होगा | वीर तूझे आना होगा!!! सिरमौर जननी …