Author: Arun Kant Shukla

घर में रहें राधा डरी डरी

छोड़ गए बृज कृष्ण, गोपी किस्से खेलें फ़ाग कहला भेजा मोहन ने, नहीं वन वहाँ, क्या होंगे पलाश? नदियों में जल नहीं, न तट पर तरुवर की छाया गोपियाँ …

तैरना आना पहली शर्त है..

तैरना आना पहली शर्त है नाव भी मैं, खिवैय्या भी मैं लहरों से सीखा है मैंने तूफां-ओ-आंधी का पता लगाना, जो बहे लहरों के सहारे, डूबे हैं तैरना आना …

पीढ़ियाँ पर बढ़ेंगी इसी राह पर आगे

कोट के क़ाज में फूल लगाने से कोट सजता है फूल तो शाख पर ही सजता है, क्यों बो रहे हो राह में कांटे तुम्हें नहीं चलना पीढ़ियाँ पर …

नाव में पतवार नहीं

नाव में पतवार नहीं हुजूर, आप जहां रहते हैं, दिल कहते हैं, उसे ठिकाना नहीं, शीशे का घर है संभलकर रहियेगा, हुजूर टूटेगा तो जुड़ेगा नहीं, यादों की दीवारे …

पूनम की रात को भी चाँद गायब हो गया

अमावस की रात को चाँद का गायब होना कोई बात नहीं जहरीली हवाओं की धुंध इतनी छाई पूनम की रात को भी चाँद गायब हो गया| दिल में सभी …

ज़िन्दगी का शायर हूँ..

ज़िन्दगी का शायर हूँ मैं ज़िन्दगी का शायर हूँ, मौत से क्या मतलब मौत की मर्जी है, आज आये, कल आये| टूट रहे हैं, सारे फैलाए भरम ‘हाकिम’ के, …

लोग सुनकर क्यूं मुस्कराने हैं लगे

लोग सुनकर क्यूं मुस्कराने हैं लगे और भी खबसूरत अंदाज हैं मरने के लेकिन इश्क में जीना ‘अरुण’ सुहाना है लगे क्यूं करें इश्क में मरने की बात इश्क …

मन का अंधियारा दूर करने

मन का अंधियारा दूर करने मन का अंधियारा दूर करने जैसे ही जला लोगे तुम एक दीप अपने मन में पहुँच जायेंगी दीप पर्व की शुभकामनाएं तुम्हारी मुझ तक …

ईश्वर भी अब मालिक हो गया है

पत्थर के देवता अब जमाने को रास नहीं आते संगमरमर के गढ़े भगवान हैं अब पूजे जाते, ईश्वर भी अब मालिक हो गया है मुश्किल है उसका अब मिलना …

लोकतंत्र में

लोकतंत्र में संघर्ष और संघर्ष प्रत्येक संघर्ष का लक्ष्य विजय विजय का अर्थ दो वक्त की रोटी/ दो कपड़े /सर पर छत अभावहीन जीवन जीने की चाहत बनी रहेगी …

फहराएंगे कल तिरंगा आराम से

हाकिम का नया क़ायदा है रहिये आराम से, गुनहगार अब पकडे जायेंगे नाम से, हाकिम को पता है उसकी बेगुनाही, वो तो सजावार है उसके नाम से, उसका सर …

मनुष्यता जहां खो जाती है..

शब्द जहां थोथे पड़ जाते हैं, संवेदना जहां मर जाती है, उस मोड़ पर आकर खड़े हो गए हम, मनुष्यता जहां खो जाती है, दर्द बयां करने से क्या …

आदमी, कारवाँ और आदमियत

आदमी, कारवाँ और आदमियत अकेले चलकर नहीं पहुंचा है, आदमी आदमियत तक, आदमी आज जहां है, कारवाँ में ही चलकर पहुँचा है, भीड़ से मंजिल का कोई वास्ता नहीं …

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने झरने पत्थरों से नहीं पहाड़ों के दिल से निकलते हैं कभी देखिये खुद को पहाड़ बनाकर आंसुओं के झरने फूटेंगे दिल में सुराख बनाकर …

‘अकेलेपन’ का अहसास

टूट रही थी सांस ‘मेरी’ और जुबां सूखी थी, तुझे नहीं पुकारा था, ‘चंद बूँद’ पानी की जरुरत थी || तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, मेरे …