Author: Saahil Parwez

मंज़िल को टटोलो…॥

वृक्ष के सम पाट खोलो अपनी मंज़िल को टटोलो। जैसे तपती धूप में भी वृक्ष करता छाँव, जितनी पत्र-भुजाएँ फैल पाती लक्ष्य-पथ को तुम न तोलो पहले मंज़िल को …

यहाँ से दूर…!!

यहाँ से दूर बहुत ही दूर खुले मैदानों में जहाँ कलियाँ मुस्कुराती है पंछी गीत गातें हैं हवा सरसराती है धूप गुनगुनाती है फिज़ा महकती जाती है जहाँ आज़ादी …

पत्थर कौन उठाएगा…!!

सबसे पहले जो खुद को झुठलाएगा, सच्चा वो उनका आशिक़ कहलाएगा।। भीड़ से मेरे यार ने ये ऐलान किया, सबसे पहला पत्थर कौन उठाएगा।। अहले-शहर के हाथ कटे क्यों …

एक टूटा हुआ सितारा हूँ…!!

एक टूटा हुआ सितारा हूँ। बाब-ए-गर्दिश का मारा-मारा हूँ।। न मिला आशियाँ कहीँ भी मुझे। जो बिखर जाए मैँ वो धारा हूँ।। चाहे ठुकरा दे या क़बूल तू कर। …