Author: ANU MAHESHWARI

सबसे पहले है देश – अनु महेश्वरी

बधाई हो बधाई हो, स्वतंत्रता दिवस की सबको बधाई हो। पाने के लिए ये आज़ादी, पुर्वजों ने दी है कुर्बानी, देखो इसे अब न कोई, ज़ख्म दे जाए। बधाई …

खुदा का है दरबार – अनु महेश्वरी

  जग में हम सभी किरायेदार, दुनिया खुदा की है दरबार, अस्थायी है अपना निवास, बाकी बातें सभी निराधार| सभी को जाना है एकबार, मन में क्यों रखे फिर भार, …

उलझा हुआ वो भी – अनु महेश्वरि

पुरुष शक्तिशाली या नारी, कोन किसपे परे है भारी, ये बहस तो चलती आयी है, सदियों तक चलती भी रहेगी। मेरा अनुभव तो कहता है, पुरुष भी मन से …

तेरा सहारा मिला – अनु महेश्वरी

मुझे जीने की कोई चाहत न होती, अगर तुम्हे भी मुझसे उल्फत न होती। मिले गर हमेशा वफ़ा में वफ़ा ही किसी ज़िन्दगी में क़यामत न होती। देखा पास …

इश्क कोई तिजारत नही है – अनु महेश्वरी

जब मिलन की इजाजत नहीं है, प्यार में फिर सदाकत नहीं है। शर्त कोई कभी हो न इसमें, इश्क कोई तिजारत नही है। आज तुम भूल बैठे हमें क्यों, …

हरी रहने दो ये धरती – अनु महेश्वरी

वृक्षो को रख, हरी रहने दो ये धरती, मत उजाड़ो, अपने मतलब से सृष्टि, विकास के नाम, चमन को जो उजाड़ा बंजर हुई धरा, तो कैसे होगा गुजारा। सूरज …

मुझे शिकवा ज़िन्दगी से नही – अनु महेश्वरी

मुझे शिकवा ज़िन्दगी से नही है, मुझे ईर्ष्या भी किसी से नही है। ज़खम मैंने खूब जीवन में झेले, मुझे उम्मीदें कहीं से नहीं है। अगर साथी ज़िन्दगी में …

उलझी है ज़िन्दगी – अनु महेश्वरी

भागती सी ज़िन्दगी में जल्दी पाने की होड़ मची, खुद की खुदी के लिए लोग रोंदते औरो की ख़ुशी| फ़ुर्सत नहीं किसी के पास हर इंसान थका सा, ज़िन्दगी …

ज़िन्दगी से शिकायत कैसी – अनु महेश्वरी

दर्द देती है, फिकी है कभी, फिर हसना भी सीखा रही, ज़िन्दगी से शिकायत कैसी, वह तो जीना ही सीखा रही| जुदाई है, गम देती है कभी, पर हर …

चुनावों के बाद – अनु महेश्वरी

यह किसने कब सोचा था, ऐसे भी दिन आएँगे, चुनावों के बाद जनता को, सब ठेंगा दिखाएंगे, बिन मुद्दे, साठगांठ कर, सत्ता को हतियाएँगे, एक हो सब, मिल बाँट …

जमाने ने यह कैसी करवट ली – अनु महेश्वरि

जमाने ने यह कैसी करवट ली है, शोर के बीच एक खामोशी सी है। यह कैसे वक़्त का आगाज हुआ, हर कोई यहाँ देखो नाख़ुश ही है। बैचेनी का …

एक की ख़ामोशी भी खलती है – अनु महेश्वरी

गलत या सही मापने का कोई पैमाना नहीं, पर मुश्किल होती, जब सिमित रख दायरा, अपनी समझ को ही, सब बस माने है सही। सब कुछ अपने हिसाब से …

खुद को समझे है ज्ञानी सब – अनु महेश्वरी

घर भरा रहता था, रिश्तेदारों से कभी, समय के साथ बदले मायने, दूर है सभी। लगे है भूलने रिश्तो की मर्यादा सब, निभाने की इन्हें फुर्सत भला कहाँ अब? …

खुद से करते रहे वादें – अनु महेश्वरी

गैरो पे कैसे होगा, भला एतबार, जब घायल, अपनो के हाथों हुआ होगा? भरोसा गर चोटिल हो बार बार, फिर दुनिया में, जीना भी दुश्वार होगा| दूर से देख, …