Author: Amar Chandratrai

बहते आंसुओं की जुबां नहीं होती.

बहते आंसुओं की जुबां नहीं होती. लफ्जों में मोहोब्बत बयां नहीं होती. मिले जो प्यार तो कद्र करना किसमत यूं हर किसी पर मेहरबान नहीं होती

तेरा नाम याद आता है

जब बैठता हु कुछ सोचने के लिये मुझे दुनियावालो का कत्ल -ए-आम याद आता है, मजहब के नाम पर जुदा कर दिया गया हमे् अपनो ने शर्म आता है …

जब ख्वाबो में मुलाकात-ए-यार हुआ करता है…..

जब ख्वाबो में मुलाकात-ए-यार हुआ करता है, हर तरफ मौसम-ए-बहार हुआ करता है , बिछा देते है उनकी रास्तो में हथेली अपना, जब कभी उनका रास्ता कांटेदार हुआ करता …

मैंने नहीं की कोई चोरी है….”अमर चन्द्रात्रै पान्डेय”

कुछ दिन पहले मैं अपने गांव के सड़क से गुजर रहा था, तभी कुछ आवाजे सुनाई दी शायद कोई लड़ रहा था….. मैंने भी हकीकत का पता लगाने का …

खूबसूरत है इश्क ……”अमर चंद्रात्रे पान्डेय”

कोई माने या न माने मगर हकिकत है इश्क , जिन्दा रहने के लिये जिन्दगी की जरूरत है इश्क , शायद इसिलिये लोग कहते है , रब के नजर …

कुछ बेचैनी सी हो रही है दिल में “अमर चन्द्रात्रै पान्डेय”

जब से देखा हु तुझको मैं हु बड़ी मुस्किल में , एक खुमारी सी छा रही है मुझको, कुछ बेचैनी सी हो रही है दिल में…. ख्वाब भी तेरा …

इजहार-ए-इश्क…..”अमर चंद्रात्रै पान्डेय”

न तुमको खबर हुई न ज़माना समझ सका… हम चुपके-चुपके तुम पे कई बार मर गए…. आँखों ने बयां करना चाहा जो इजहार-ए-इश्क तुमसे….. पर देख तेरी खामोशी वो …

हुज़ूर धीरे धीरे….”अमर चंद्रात्रै पान्डेय”

जब ऱूख से हटा रही थी वो नकाब धीरे धीरे, बादलों से जैसे निकल रहा था आफताब धीरे धीरे, जान ले रही थी ” अमर ” उनकी वो शोख …

”अमर हमारा साथ रहे”………॰अमर चंद्रात्रे पान्डेय…..

चांदनी रात हो और तुम्हारा साथ रहे, रिमझिम बरसात हो जब हमारी मुलाकात रहे, खो जाये हम एक दुसरे की आँखों मे कुछ इस तरह, जो देखे वो बस …

“आंधी में चिराग”…..अमर चंद्रात्रे पान्डेय…..

दिल को रह रह के नया अंदेशा डराने लग जाए , वापसी में उसके मुमकिन है ज़माने लग जाए, सो नहीं पाए तो सोने की दुआएं , नींद आने …

“विदाई “……अमर चंद्रात्रे पान्डेय…..

रस्म रिवाज अब हुआ सब पूरा आया वक्त विदाई का, छोड़ जाने का समय हो गया बाबुल की अंगनायि का, आंखों में आंसू लिए बेटी कर रही सवाल, कौन …

“इज़हार ए हाल”……अमर चंद्रात्रे पान्डेय…….

न जाने कैसे उनसे इज़हार ए हाल कर बैठे, बातों ही बातों में यह कमाल कर बैठे, जिन्हें शौक था नजरों से कत्लेआम करने का, उन्हीं से हम अपनी …

“अपनो से दुर”….अमर चन्द्रात्रे पान्डेय…..

अपनों से बहुत दूर अपना आशियाना बन गया, हाय यह कैसा जिंदगी का फसाना बन गया, जिस गांव की मिट्टी से था हमारा दिल का रिश्ता, उसकी यादों का …

“मेरा चांद न आया”-…..अमर चंद्रात्रै पान्डेय.

( नमस्ते दोस्तों ।ये मेरी पहली रचना है अाशा करता हू कि आपलोगों को पसन्द आएगी ।) सुहाना था सफर आसमान में बादल छाए थे, भरी बरसात के बीच …