Author: अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

|| ईमानदारी की परीक्षा ||

जब जीवन की जीवनी मे, जब मैने ईमानदारी का चुनाव किया । शुभेच्छुओं का लगता रहा तांता, सबने एक सा मशवरा दिया ।।1 ।। इस राह मे ‘मित्र’ दोस्त …

|| मन की गहराई ||

जग में गहराई की सीमा, मानव कभी माप सकेगा क्या | किसमें कितनी गहराई है, व्याख्या कोई कर सकेगा क्या || 1 || धरा से सूरज-चाँद की दूरी की, …

|| भानुमती की पीड़ा ||

जीवन के ढलते पड़ाव पर, मानव भावुक हो जाता है रंचमात्र भी दुःख मिले तो, मन और अशक्त हो जाता है || 1 || क्षोभ दुःख हो जीवन जिसका, …

|| होली का संदेशा ||

होली रंगों का त्यौहार , मानवता का ये सिंगार | शत्रु को भी लगाता गले से , प्रेम भाव के देता विचार ||1|| बच्चों की होती अपनी होली , …

|| मानवता प्रेमी ||

गीता कहती इस जग में, मनुष्य की दो ही जाति हैं | इक मानव दूजा दानव, अन्य न गतियॉं प्राप्त हैं ||1|| दैवी सम्पदा से पूर्ण मनुज ही, जग …

|| माँ दुर्गा प्रार्थना ||

दुर्गा दुर्गति नाशिनी माता , भक्तों के तुम कष्ट हरो | करो दया हे मातु भवानी , दुर्गति जन की दूर करो || 1 || शुम्भ निशुम्भ विनाशिनी माता …

|| मेरा अंतिम संदेश ||

आज चला मैं धरती की गोद में, हँस कर मुझको विदा करो । मैं जीवित हूँ तुम्हारे दिल में, दिल से मुझको याद करो ॥1॥ खुली किताब था जीवन …

|| जिंदगानी की कहानी ||

अजब है कहानी तेरी जिंदगानी, कभी देती खुशियाँ कभी दु:ख की निशानी | खुशियों की मस्ती कभी जगमगाती, कभी बहते आंसू ग़मों की निशानी किसी की खुशी न सदा …

|| जिन्दगी ||

जिन्दगी एक अबूझ पहेली, प्रतिपल घड़ियाँ नई नई | जिन्दगी को हम समझ ना पाए, और जिन्दगी बीत गई ||१|| बचपन से लेकर बुढ़ापे तक मानव, सिर धुन धुन …

|| भगवद्गीता ज्ञानामृत ||

॥ दोहा ॥ जय योगेश्वर जय परमेश्वर, जय जग के तारनहार | मुखारविंद से निःसृत वाणी, करती जगदोद्धार || वह वाणी पाकर जिसे, हुईं सरस्वती धन्य | तुलना कर …

॥ योगेश्वर वन्दना ॥

हे जगदगुरू हे जगपिता, तुम जग के तारनहार हो । संसार की नैय्या के तुम ही, मात्र खेवनहार हो ॥१॥ हे जगदगुरू हे जगपिता… बन्धु तुम्ही हो, सखा भी …

॥ माँ सरस्वती वन्दना ॥

जय जयति माँ हँसारिणी, निज दास को वरदान दे । दे कर कृपा का वरदहस्त, इस लेखनी को मान दे ॥१|| जय जयति… हे शुभ्रवस्त्राधारिणी ! जड़ भक्त की …